Chhath Puja: दौड़ा-कलसूप बनाकर आजीविका चला रहे बांसफोर परिवार, छठ पर्व बना उम्मीद की किरण
सरकार से आर्थिक सहायता और कुटीर उद्योग को बढ़ावा देने की मांग

छपरा (रिविलगंज)। लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा ने एक बार फिर दौड़ा-कलसूप बनाने वाले कारीगरों के चेहरे पर मुस्कान ला दी है। छठ पर्व के दौरान अर्घ्यदान के लिए प्रयुक्त ये बांस निर्मित पारंपरिक सामग्री हर व्रती के पूजा-सामान का अहम हिस्सा होती है। इसी वजह से इनकी मांग में जबरदस्त बढ़ोतरी देखी जा रही है।
रिविलगंज नगर पंचायत क्षेत्र के शमशुद्दीनपुर (गंदी बस्ती) में रहने वाले करीब आधा दर्जन बांसफोर परिवार हर वर्ष छठ पर्व से पहले दौड़ा, कलसूप और छैटी बनाने के कार्य में जुट जाते हैं। इन परिवारों के लिए यही पारंपरिक पेशा आजीविका का प्रमुख साधन है।
कारीगर मंजू देवी, दिलीप बांसफोर, अगरावती देवी, मनोज बांसफोर, रिंकू देवी, पिंटू बांसफोर, संगीता देवी और शारदा देवी बताते हैं कि छठ पर्व के समय कलसूप-दौड़ा की मांग सबसे अधिक होती है। मंजू देवी कहती हैं, “हमलोग साल भर यही काम करते हैं, लेकिन छठ पूजा पर मांग बढ़ जाती है। इसी समय कुछ अतिरिक्त आमदनी हो जाती है जिससे त्योहार में घर का खर्च चल पाता है।”
हालांकि, कारीगरों ने महंगाई की मार की चिंता भी जताई। मनोज बांसफोर ने बताया, “पहले 20-25 रुपए में एक कलसूप बेचकर भी कुछ बचत हो जाती थी, लेकिन अब 60 रुपए में भी मेहनत का पूरा मोल नहीं मिलता। फिर भी परंपरा को जिंदा रखने के लिए यह काम करते हैं।”
सरकार से आर्थिक सहायता और कुटीर उद्योग को बढ़ावा देने की मांग
कारीगरों ने सरकार से आर्थिक सहायता और कुटीर उद्योग को बढ़ावा देने की मांग की है। उन्होंने कहा कि यदि बांस शिल्प से जुड़े परिवारों को सरकारी सहयोग मिले तो यह पुराना पेशा न केवल जीवित रहेगा बल्कि रोजगार का बेहतर साधन भी बन सकता है।
पहुंच मार्ग की स्थिति अब भी सुधरने की जरूरत
स्थानीय लोगों ने बताया कि बांसफोर बस्ती में सामुदायिक शौचालय, पानी और बिजली की सुविधा तो है, लेकिन सफाई और पहुंच मार्ग की स्थिति अब भी सुधरने की जरूरत है। ऐसे में छठ पर्व की रौनक के बीच इन कारीगरों की उम्मीदें इस बात पर टिकी हैं कि उनकी मेहनत का सही मूल्य मिले और सरकार उनकी स्थिति सुधारने की दिशा में कदम उठाए।
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