UGC Equality Regulations: शिक्षा में समानता या सवर्ण बनाम सामाजिक न्याय? नया नियम बना देशव्यापी सियासी बहस का केंद्र
सवर्ण वर्चस्व बनाम सामाजिक न्याय

UGC Equality Regulations 2026: देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था में लागू हुआ एक नया नियम इन दिनों सिर्फ विश्वविद्यालयों के गलियारों तक सीमित नहीं है, बल्कि राजनीति, समाज और सोशल मीडिया तक तीखी बहस का विषय बन गया है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लागू किए गए ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026’ को जहां एक वर्ग ऐतिहासिक और सामाजिक न्याय की दिशा में बड़ा कदम बता रहा है, वहीं दूसरी ओर इसे लेकर विरोध की आवाजें भी तेज हो गई हैं। खासकर अगड़ी जातियों से जुड़े संगठनों और प्रभावशाली धार्मिक-सामाजिक नेताओं ने इस नियम पर सवाल खड़े किए हैं। यूपी विधानसभा चुनाव 2027 से पहले यह मुद्दा अब सियासी रंग लेता दिख रहा है।
क्या है UGC और उसका नया रेगुलेशन?
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) देश में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता, समान अवसर और नियमन से जुड़ी शीर्ष संस्था है। इसी आयोग ने 15 जनवरी 2026 से देशभर के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में UGC Equality Regulations 2026 लागू कर दिए हैं। इस नियम का उद्देश्य कैंपस में जातिगत भेदभाव को रोकना और सभी वर्गों के लिए समान, सुरक्षित व सम्मानजनक शैक्षणिक माहौल सुनिश्चित करना बताया गया है।
अब तक उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतें मुख्य रूप से एससी और एसटी समुदाय से संबंधित मानी जाती थीं। लेकिन नए नियम के तहत ओबीसी वर्ग को भी स्पष्ट रूप से जातिगत भेदभाव की श्रेणी में शामिल कर लिया गया है। इसका अर्थ है कि अब ओबीसी छात्र, शिक्षक और कर्मचारी भी भेदभाव या उत्पीड़न की शिकायत आधिकारिक रूप से दर्ज करा सकेंगे।
हर संस्थान में क्या-क्या होगा अनिवार्य?
UGC के नए रेगुलेशन के तहत सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में कई व्यवस्थाएं अनिवार्य कर दी गई हैं
- एससी, एसटी और ओबीसी के लिए समान अवसर प्रकोष्ठ का गठन
- यूनिवर्सिटी स्तर पर Equality Committee की स्थापना
- समिति में ओबीसी, महिला, एससी, एसटी और दिव्यांग वर्ग के प्रतिनिधियों की अनिवार्य भागीदारी
- हर छह महीने में रिपोर्ट तैयार कर UGC को भेजना
UGC का दावा है कि इससे शिकायतों की निगरानी, जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ेगी।
विरोध क्यों कर रही हैं अगड़ी जातियों से जुड़ी संस्थाएं?
रेगुलेशन लागू होते ही देश के कई हिस्सों में अगड़ी जातियों से जुड़े संगठनों में नाराजगी देखने को मिली। विरोध करने वालों का कहना है कि इस कानून का दुरुपयोग कर झूठे मामलों में फंसाया जा सकता है। जयपुर में करणी सेना, ब्राह्मण महासभा, कायस्थ महासभा और वैश्य संगठनों ने मिलकर ‘सवर्ण समाज समन्वय समिति (S-4)’ का गठन किया है, ताकि इस नियम के खिलाफ संगठित आंदोलन चलाया जा सके।
यूपी में क्यों बढ़ा राजनीतिक तापमान?
उत्तर प्रदेश में यह मुद्दा सबसे ज्यादा गर्माया हुआ है। गाजियाबाद डासना पीठ के पीठाधीश्वर यति नरसिंहानंद गिरि ने खुले तौर पर इस नियम का विरोध किया। जंतर-मंतर पर अनशन के लिए जाते समय उन्हें पुलिस ने नजरबंद कर दिया, जिसके बाद उन्होंने योगी सरकार पर सवर्ण समाज की आवाज दबाने का आरोप लगाया। सोशल मीडिया पर भी बहस तेज है। कई यूट्यूबर और इंफ्लुएंसर इसे “सवर्ण विरोधी कानून” बता रहे हैं, जबकि सामाजिक न्याय समर्थक इसे बराबरी और सम्मान की दिशा में जरूरी कदम बता रहे हैं।
आंकड़े क्या कहते हैं?
UGC ने संसद और सुप्रीम कोर्ट में पेश आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया है कि—
- पिछले 5 वर्षों में जातिगत भेदभाव की शिकायतों में 118.4% की वृद्धि
- 2019-20 में 173 शिकायतें
- 2023-24 में 378 शिकायतें
- 704 विश्वविद्यालयों और 1553 कॉलेजों से कुल 1160 शिकायतें
UGC इन आंकड़ों को नए नियम के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क के रूप में पेश कर रहा है।
सवर्ण वर्चस्व बनाम सामाजिक न्याय
आलोचकों का कहना है कि यह नियम सवर्ण समाज को निशाना बनाता है, जबकि समर्थकों का तर्क है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में आज भी वंचित वर्गों की भागीदारी 15 प्रतिशत से कम है।
एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम लागू हुए 36 साल बाद भी उत्पीड़न की घटनाएं खत्म नहीं हुई हैं। ऐसे में समर्थकों के अनुसार, UGC का यह कदम जरूरी सुधार है।
शिक्षा से राजनीति तक जाएगा असर?
UGC Equality Regulations 2026 अब सिर्फ एक शैक्षणिक सुधार नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक बहस बन चुका है। यूपी चुनाव 2027 से पहले यह मुद्दा और तेज होने की संभावना है।
सबसे बड़ा सवाल यही है क्या यह नियम वाकई समानता की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा, या फिर समाज में ध्रुवीकरण को और गहरा करेगा? आने वाले महीनों में इसका असर कैंपस से निकलकर चुनावी राजनीति तक साफ नजर आ सकता है।
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