
पटना। सड़क किनारे फेंका गया एक पॉलिथीन बैग, उसमें लिपटे सब्जी के छिलके या बचा हुआ खाना। यही छोटी सी लापरवाही आपके मवेशी की जान ले सकती है। डेयरी, मत्स्य एवं पशु संसाधन विभाग ने इस गंभीर खतरे को लेकर आम लोगों को सचेत किया है।
कैसे बनता है पॉलिथीन ‘साइलेंट किलर’?
पॉलिथीन चिकना और स्वादरहित होता है। गाय, भैंस या बकरी जब सड़क किनारे या खेत में चरती हैं, तो खाने की गंध के साथ पॉलिथीन को भी बिना समझे निगल जाती हैं। एक बार पेट में पहुंचने के बाद यह पचता नहीं बल्कि धीरे-धीरे आंतों में जमा होता रहता है और कड़ी गेंद या रस्सी का रूप ले लेता है।
इसके बाद शुरू होती है तकलीफ भूख न लगना, दस्त, गैस (अफरा) और तेज पेट दर्द। पशु कमजोर होता जाता है, लेकिन बाहर से कारण दिखता नहीं। यही वजह है कि इसे ‘साइलेंट किलर’ कहा जाता है।
न दवा, न सूई सिर्फ ऑपरेशन
विभाग ने साफ कहा है कि पॉलिथीन का कोई दवाई या इंजेक्शन से इलाज संभव नहीं। पेट से पॉलिथीन और उसके साथ जमा सामग्री को निकालने के लिए ऑपरेशन ही एकमात्र रास्ता है और यह महंगा भी है, जोखिम भरा भी है।
क्या करें, क्या न करें?
विभाग ने अपील की है कि खाद्य पदार्थ, सब्जी के छिलके या खाना कभी भी पॉलिथीन में बंद कर सड़क, रेल पटरी, खेत, नदी या तालाब के किनारे न फेंकें। पॉलिथीन कैरी बैग पर लगे कानूनी प्रतिबंध का पालन करें और कपड़े या जूट के थैले का उपयोग करें।
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- वर्ष 2015 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय है। दैनिक भास्कर, अमर उजाला और हिन्दुस्थान समाचार में सेवाएं दीं। उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए कई मंचों से सम्मानित। वर्तमान में Publisher & Editor-in-Chief के रूप में निष्पक्ष और जनहितकारी डिजिटल पत्रकारिता में निरंतर सक्रिय है।
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