Political News: लालू यादव की डोर से बंधी है सम्राट की सत्ता
राजद का आधार कमजोर हुआ तो नीतीश की तरह चौधरी को भी निपटा देगी भाजपा

वीरेंद्र यादव, वरिष्ठ पत्रकार
पटना : अब बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी हैं। वे कोईरी जाति से आते हैं और उनसे पहले सतीश प्रसाद सिंह भी मुख्यमंत्री बने थे, जो इसी जाति के थे। मतलब सम्राट चौधरी दूसरे कोईरी मुख्यमंत्री हैं। सतीश प्रसाद सिंह की भी सत्ता की डोर यादव से बंधी थी और सम्राट की सत्ता की डोर भी यादव से बंधी है। बस नेता का नाम बदल गया है और राजनीतिक परिस्थितियां बदल गयी हैं।
सतीश प्रसाद सिंह बीपी मंडल की राजनीतिक ताकत की उपज थे और सम्राट चौधरी लालू यादव की राजनीतिक ताकत की उपज हैं। हम राजद, जदयू या हम वाले सम्राट चौधरी की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि भाजपा वाले सम्राट की बात कर रहे हैं। लालू यादव और उनकी पार्टी राजद का राजनीतिक आधार मजबूत है। इसलिए सम्राट को भाजपा ने मुख्यमंत्री बनाया है। भाजपा का मानना है कि लालू यादव के मजबूत आधार से मुकाबले के लिए उसी जाति वर्ग की बड़ी आबादी वाला वोट समूह चाहिए। इस मानक पर सम्राट चौधरी अनुकूल बैठ रहे हैं।
हम आते हैं 2020 के विधान सभा चुनाव परिणाम पर। 2020 में भाजपा के 74 विधायक थे, जबकि नीतीश कुमार के पास मात्र 43 विधायक थे। उस समय जदयू में कोईरी-कुर्मी विधायकों की संख्या मात्र 11 थी। इसके बावजूद भाजपा ने नीतीश कुमार का नेतृत्व स्वीकार किया और ढोया। उसकी वजह थी कि विधान सभा में राजद विधायकों की संख्या 75 थी। इसका मतलब यह है कि राजद मजबूत था तो नीतीश कुमार भी मजबूत थे, भले उनके विधायकों की संख्या मात्र 43 थी। इस संख्या बल के गणित में नीतीश कुमार के पास डोल-पत्ता खेलने यानी पलटी मारने का पूरा विकल्प मौजूद था। इसलिए भाजपा नतमस्तक थी।
अब आते हैं 2025 में। 2025 के विधान सभा चुनाव परिणाम में भाजपा विधायकों की संख्या 89 थी और जदयू विधायकों की संख्या 85 थी। इस बार जदयू में कोईरी-कुर्मी विधायकों की संख्या 23 है। इसके बावजूद इस कार्यकाल में नीतीश कुमार सौ दिन भी चैन से कुर्सी पर बैठ नहीं पाये थे कि भाजपा ने विदाई की पटकथा बांच दी। राज्यसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाकर उनकी विदाई तय कर दी। वजह थी कि लालू यादव के विधायकों की संख्या 25 पर सिमट जाना। लालू यादव कमजोर हुए तो नीतीश कुमार के पास डोल-पत्ता खेलने का अवसर भी समाप्त हो गया। इस अनुकूल माहौल में भाजपा ने नीतीश को धकिया दिया।
स्पष्ट शब्दों में कहें तो विधान सभा में लालू यादव कमजोर हुए तो नीतीश नकारा हो गये। अब यही खतरा सम्राट चौधरी के लिए है। नीतीश के साथ भाजपा की प्रतिस्पर्धा विधान सभा में संख्या पर केंद्रित थी। इसलिए लालू यादव का संख्या बल कमजोर हुआ तो नीतीश को भाजपा ने निपटा दिया। इसके विपरीत भाजपा के लिए सम्राट आंतरिक मामला हैं और नया खेल आधार वोट पर केंद्रित है।
लालू यादव को 2020 और 2025 के विधान सभा चुनाव में लगभग बराबर वोट आया था 23 प्रतिशत। दोनों चुनावों में राजद उम्मीदवार की संख्या भी लगभग बराबर। एकाध कम या अधिक। मतलब भाजपा फ्री बिजली, पेंशन राशि में वृद्धि और दस हजरिया नोट फाॅर वोट स्कीम के बावजूद लालू यादव का आधार वोट कम नहीं कर पायी। इसलिए नये आधार वोट को साधने के लिए सम्राट चौधरी को सूली पर चढ़ाया है।
सम्राट की उपयोगिता तभी तक है, जब तक लालू यादव का आधार मजबूत है। जिस दिन लालू यादव का आधार वोट कमजोर हुआ, उसी दिन भाजपा सम्राट चौधरी को निपटा देगी, सत्ता से बेदखल कर देगी।
यही सम्राट के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। नीतीश कुमार लालू यादव को विधान सभा में संख्या बल में कमजोर करके खुद तिरोहित हो गये। लालू यादव के आधार वोट को कमजोर करने की कोशिश करने में सम्राट सफल हुए तो नीतीश कुमार की तरह उन्हें भी उच्च सदन की राह दिखा दी जाएगी।
सम्राट का कार्यकाल तभी दीर्घकालीक होगा, जब लालू यादव और उनकी ताकत भाजपा को बेचैन किये रहेगी। जिस दिन भाजपा के अंदर लालू यादव का डर खत्म हो जाएगा, उस दिन भाजपा के लिए सम्राट भी अप्रासंगिक हो जाएंगे।
मतलब सम्राट चौधरी की सत्ता की डोर राजद से बंधी है और इस नाजुक यथार्थ को सम्राट चौधरी अनदेखी नहीं कर सकते हैं।
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- अंकिता कुमारी पत्रकारिता की छात्रा हैं। वर्तमान में वह संजीवनी समाचार डॉट कॉम के साथ इंटर्नशिप कर रही हैं और समाचार लेखन व फील्ड रिपोर्टिंग में सक्रिय रूप से जुड़ी हुई है।
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