छपरा से जुड़ा है मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का इतिहास, रिविलगंज में हनुमान जी का ननिहाल

छपरा

छपरा। प्रभु श्रीराम सबके हैं और सारण के निवासियों के भी। सारण्यक संस्कृति वाला आरण्यक भू-भाग रहा है यह भूमि। गंगा, सरयू, गंडक और सोन जैसी पावन नदियों की संगम स्थली है सारण। सतयुगीन ऋषि दधिचि, महर्षि शृंगी और गौतम की इस तपोभूमि पर सारण के समाज ने श्रीराम के महत्व को समझा।

यहां के गौतम स्थान पर जब श्रीराम ने माता अहिल्या का उद्धार किया तो सारण के लोगों ने उनका आभार प्रकट करते हुए पहली बार देव की संज्ञा दी। इसके पूर्व तो लोग उन्हें राजपुत्र, वीर धनुर्धारी ही समझते थे। अहिल्या उद्धार कोई सामान्य घटन नहीं थी।

यह भविष्य का संकेत था। संकेत श्रीराम के हाथों से इस आर्यावर्त का इतिहास लिखे जाने का था। बक्सर से जनकपुरी जाने की राह में सारण की भूमि पर अहिल्या उद्धार वाल्मीकिकृत रामायण हो या तुलसी दास की रामचरित मानस या फिर और कोई रामायण।

सभी बतातें हैं कि महर्षि विश्वामित्र के बुलावे पर श्रीराम अपने अनुज लक्ष्मण के साथ बिहार के बक्सर पहुंचे थे। उद्देश्य राक्षसों की प्रताड़ना से ऋषि-मुनियों को मुक्ति दिलाना था। श्रीराम ने अपने अनुज के साथ इस काम को बखूबी किया और बक्सर की धरती पर राक्षसी ताड़का का वध किया। यहां से गुरु वशिष्ठ श्रीराम और लक्ष्मण को लेकर पैदल जनकपुरी के लिए चले तो उनका पहला पड़ाव सारण था।

यहां रिविलगंज के गोदना सेमरिया यानी गौतम स्थान में महर्षि गौतम की पत्नी अहिल्या उनके ही श्राप से पत्थर बन किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में थीं। यह महर्षि गौतम का विवादित निर्णय था, जिसकी सत्यता सिद्ध होने पर स्वयं अहिल्या को श्रीराम के चरण स्पर्श से श्रापमुक्त होने का रास्ता बताये थे। श्रीराम गौतम स्थान आये और पत्थर बनी माता अहिल्या को देखे। मुनि विश्वामित्र से उनकी कहानी विस्तार से जाने।

फिर, अपना चरण अहिल्या के सिर से स्पर्श कराये और वे पूर्व स्थिति में आ गईं। तत्कालीन सारण ने माता अहिल्या को पुनः स्वीकार कर लिया। यहीं पर प्रभु श्रीराम के चरण चिह्न होने की बात कही जाती है, जिसकी लोग आज भी पूजा करते हैं।

अहिल्या उद्धार स्थली का विवाद है निर्मूलक श्रीराम ने माता अहिल्या का उद्धार किया। इस सत्यता को रामायण ही नहीं इतिहास भी स्वीकार करता है। पर, कहां और वह स्थली कौन सी है, अहिल्या उद्धार स्थली को लेकर यदि विवाद है तो इसे किस आधार पर सिद्ध किया जाए।

तार्किक रूप से यह बात समझने की है कि बक्सर से जनकपुरी श्रीराम किस राह से गए होंगे। वे क्या बक्सर से सीधे पूरब दिशा में बढ़े। फिर आज के मोकामा से आगे बढ़कर उत्तर दिशा में मुड़े और जनकपुरी पहुंचे, या फिर बक्सर से तिरछे होकर बलिया और सारण होते हुए जनकपुरी पहुंचे।

यदि श्रीराम सीधे पूरब दिशा होकर जनकपुरी गए होते तो इस राह को तय करने में मुनि विश्वामित्र को अतिरिक्त 15 दिन देने पड़े होंगे, जबकि बक्सर से बलियां-सारण के तिरछे रास्ते से उन्हें 15 दिन कम लगे होंगे।

ऐसे में मुनि विश्वामित्र मोकामा होकर जाने को क्यूं सोचते।  कहते हैं कि जो बातें इतिहास में दर्ज नहीं हो पाती वह साहित्य का अंग बनती है और साहित्य से भी छूट जाने पर लोगों के बीच चर्चा में जीवित रहती है। सारण के हर जुबान पर यह आज भी है कि महर्षि गौतम की तपोस्थली और आश्रम रिविलगंज के गोदना सेमरिया में था, जो आज गौतम स्थान के नाम से जाना जाता है और अहिल्या उद्धार यहीं हुआ था।

ध्यातव्य है कि मुनि विश्वामित्र मिथिला जाने की राह में श्रीराम को ऋषि-मुनियों से मिलवाने की मंशा भी रखे हुए थे। ऐसे में वे राजा दशरथ का पुत्रोष्ठि यज्ञ कराने वाले महर्षि श्रृंगी, महर्षि दधिचि आदि संत-महात्माओं से श्रीराम को कैसे नहीं मिलवाते। इन ऋषि-महात्माओं का आश्रम वन व नदियों से आच्छादित सारण की पावन धरती पर ही था।

मोकामा की राह वाले इलाकों में ऋषियों की तपोस्थली का इतिहास कहां कहीं मिलता है। इन तार्किक विश्लेषणों के आधार पर बस यही कहा जा सकता है कि बक्सर से सारण में अहिल्या उद्धार करने के बाद श्रीराम चलकर जनकपुरी पहुंचे और वहां पुष्प वाटिका में माता सीता के समक्ष प्रकट हुए।

सारण के रिविलगंज प्रखंड अंतर्गत गोदना सेमरिया गांव से श्रीराम का एक और संबंध जुड़ा हुआ है। पौराणिक कथाओं के अनुसार यह गांव उनके अनन्य भक्त वीर हनुमान का ननिहाल भी है। यहां के स्थानीय लोग बजरंग बली को भगीना का दर्जा देते हैं। आज भी उन्हें बुढ़ऊ नाम से संबोधित करते हैं। हनुमान जी गौतम ऋषि और उनकी पत्नी अहल्या की पुत्री अंजनी बजरंग बली की माता थी।

उनका विवाह बानरराज केशरी से हुआ था। गोदना सेमरिया में महर्षि गौतम का आश्रम था और माता अंजनी यहीं रहती थीं। मान्यता है कि पवन पुत्र हनुमान का बचपन इसी आश्रम में बीता।

श्रीराम ने सम्होता में की नीलकंठेश्वर महादेव की स्थापना बक्सर से जनकपुरी की पैदल यात्रा में श्रीराम ने ऋषि विश्वामित्र के आदेश पर सारण के जलालपुर प्रखंड के सम्होता में नीलकंठेश्वर महादेव की स्थापना की। तब इस गांव का नाम सम्भूता था जो बाद के दिनों में सम्होता और समहुता कहा जाने लगा।

इस गांव में मान्यता है कि मुनि विश्वामित्र श्रीराम और उनके अनुज लक्ष्मण के साथ इस गांव में ठहरे थे और शिवलिंग की स्थापना करने के बाद सत्तू – मूली भोजन किये थे। कहते हैं कि वह कार्तिक पूर्णिमा का दिन था। आज भी सम्होता सहित पूरे सारण में कार्तिक पूर्णिमा के दिन सत्तू-मूली खाने की परंपरा जीवित है। सम्होता का शिवलिंग सारण में नीलकंठेश्वर महादेव शिवालय के नाम से प्रसिद्ध है।

यह शिवलिंग बाबा विश्वनाथ की तरह है और पत्थर का आकार-प्रकार भी वैसा ही है।  सारण के कुमना में ऋषि कुंभज का दर्शन करने पहुंचे थे श्रीराम बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के अवकाश प्राप्त प्रोफेसर डा. रविन्द्रनाथ मिश्र ने श्रीराम परिभ्रमण पर शोध किया है। उनकी शोधपत्र बताती है कि सम्होता में शिवलिंग स्थापना के बाद ऋषि विश्वामित्र श्रीराम को पास के कुमना गांव में लेकर गये थे।

राम और लक्ष्मण ने ऋषि कुंभज का दर्शन कर आशीर्वाद लिये थे

यहां कुंभज ऋषि का आश्रम था। श्रीराम और अनुज लक्ष्मण ने यहां ऋषि कुंभज का दर्शन कर आशीर्वाद लिये थे। कुमना स्थित ऋषि कुंभज के आश्रम की गाथा पुराणों में वर्णित है। इसमें कहा गया है कि भगवान शंकर और देवी पार्वती इस आश्रम में लगभग प्रतिदिन ऋषि कुंभज से सत्संग सुनने आया करते थे। बरवाघाट पर घोघारी नदी में श्रीराम ने धोये थे अपने पैर मशरक प्रखंड के बरवाघाट पर जनकपुरी जाने के दौरान श्रीराम ने नाव से घोघारी नदी को पार किया था।

वह कार्तिक पूर्णिमा के बाद का दूसरा दिन था। स्थानीय लोग बताते हैं कि उन्होंने अपने पूर्वजों से सुन रखा है कि नाव से घोघारी नदी पार करने के पूर्व श्रीराम ने यहां अपने पांव धोये थे और शिव आराधना की थी। सारण के लोगों के बीच आज भी यह मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दूसरे दिन बरवाघाट पर घोघारी नदी में पांव धोने पर सभी पाप मिट जाते हैं।

यहां अब भी कार्तिक पूर्णिमा के दूसरे दिन मेला लगता है

यहां अब भी कार्तिक पूर्णिमा के दूसरे दिन मेला लगता है। दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं और घोघारी नदी में अपना पैर धोते हैं, फिर पास के शिवालय और राम मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं।

श्रीराम लला की स्थापना से उल्लास पर रामायण सर्किट से न जुड़ने का मलाल अयोध्या में मंदिर निर्माण और श्रीराम लला की स्थापना को लेकर सारण के लोगों में उल्लास है। पर, एक मलाल भी है कि अहिल्या उद्धार की भूमि रामायण सर्किट से नहीं जुड़ पाई। यहां के लोगों का कहना है कि रामायण सर्किट की परिकल्पना निश्चित तौर पर ऐतिहासिक पहल है।

पर, अहिल्या उद्धार की भूमि सारण का इससे नहीं जुड़ना उनके समझ से परे है। अयोध्या से लेकर जनकपुर और फिर अयोध्या से चित्रकुट, किष्किंधा और रामेश्वर तक रामायण सर्किट का बनना भारत वासियों के लिए गर्व का विषय है। आज जब पूरा भारत राममय हो गया है तो सारण को रामायण सर्किट से नहीं जुड़ पाने का मलाल है।

यहां के लोग इसे षडयंत्र मानते हुए कहते हैं कि रामायण सर्किट निर्धारण में बाल्मिकी रामायण को हीं एकमात्र आधार माना गया और अहिल्या उद्धार की भूमि व श्रीराम की जनकपुरी यात्रा का गवाह सारण को इससे वंचित कर दिया गया। रामायण कालीन पर्यटन तो कब से राह निहार रहा है कि मुझे सारण में ले चलो।