हाथी ‘पांव’ के साथ जिंदगी जी रहा हैं कबाड़ी का काम करने वाला सारण का कृष्णा, अब दूसरों को करता है जागरूक

छपरा

छपरा। 5 साल पहले बुखार आता था। मशरक के अप्रशिक्षित चिकित्सक से इलाज करा लेता था। कुछ व्यक्त के लिए आराम भी मिल जाता था। ज्यादा दिक्कत होने पर अस्पताल में जांच करवाई। रिपोर्ट में फाइलेरिया की पुष्टि हुई।” लापरवाही के चलते मर्ज बढ़ गया। बायां पैर हाथी पांव हो गया। 5 साल से इस परेशानी के साथ जी रहा हूँ । उठने-बैठने व चलने- फिरने में बहुत दिक्कत आ रहा है। दवा के साथ ही जिंदगी गुजारनी पड़ रही है।

मशरक नगर पंचायत के तख्त टोला गांव के रहने वाले 22 वर्षीय कृष्णा कुमार जो कबाड़ का काम करने वाले ने भावुक होकर यह बात कहीं। वह अब पड़ोसियों और रिश्तेदारों को फाइलेरिया की दवा खाने के लिए बोल रहा हैं। उसने बताया कि बुखार, दर्द के साथ उसके बाएं पैर में सूजन आने लगी।
सरकारी अस्पताल में इलाज के बाद फाइलेरिया बीमारी का पता चला। स्वास्थ्य विभाग की टीम ने उन्हें दवा देते हुए अब उम्र भर इसका सेवन करने की सलाह दी। मर्ज न बढ़े इसके लिए अब सिर्फ दवा ही एकमात्र उपाय बचा है।
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मशरक के चिकित्सक डॉ चन्द्रशेखर सिंह ने बताया कि फाइलेरिया वेक्टरजनित रोग है। यह मादा क्यूलेक्स मच्छर के काटने होता है। इसे लिम्फोडिमा (हाथी पांव) भी कहा जाता है। यह न सिर्फ व्यक्ति को दिव्यांग बना देती है बल्कि इससे मरीज की मानसिक स्थिति पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। शरीर में फाइलेरिया के लक्षण मिलना माइक्रो फाइलेरिया कहलाता है। शुरूआती दिनों में डाक्टर की सलाह पर दवा का सेवन किया जाए तो इसका परजीवी नष्ट हो जाता है।