
वीरेंद्र यादव, वरिष्ठ पत्रकार
पटना। समाजवाद की अंतिम आवाज भी आज यानी 8 मार्च को थम गयी। नीतीश कुमार गला फाड़-फाड़कर लालू यादव के परिवारवाद की आलोचना करते थे। वंशवाद को लोकतंत्र के लिए अभिशाप बताते थे। लेकिन आखिरकार नीतीश भी पुत्रमोह में पड़ गये। अपने पुत्र निशांत के राजनीतिक भविष्य कोे उज्ज्वल बनाने की भाजपाई गारंटी की शर्त पर समाजवाद का पिंडदान कर दिया। डाॅ लोहिया और जननायक कर्पूरी ठाकुर की विचारधारा की दुकान पर पुत्र को सेल्समैन बनाकर बैठा दिया। अब पार्टी का भविष्य निशांत कुमार होंगे। निशांत कुमार के सदस्यता ग्रहण के दौरान प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा ने उन्हें पार्टी का भविष्य बताया। राजनीतिक गलियारे की चर्चा के अनुसार, सांसद और विधायकों के आग्रह और पार्टी को बचाने के लिए नीतीश कुमार ने निशांत को राजनीति में लाने का प्रस्ताव स्वीकार किया।
1997 में राजनीतिक साजिश और न्यायिक प्रक्रिया के कारण लालू यादव को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने की स्थिति आ गयी थी।
उन्होंने पार्टी के सांसद-विधायकों के आग्रह और पार्टी को एकजुट बनाये रखने के लिए राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाने का प्रस्ताव स्वीकार किया था। जैसे आज नीतीश कुमार ने स्वीकार किया है। लालू यादव के इसी फैसले के खिलाफ नीतीश कुमार लंबी लड़ाई लड़ते रहे थे। इस लड़ाई में रामविलास पासवान, जीतनराम मांझी से लेकर उपेंद्र कुशवाहा तक नीतीश के सुर-सुर मिला रहे थे। लेकिन समय आने पर सभी अपने परिवार को ही पार्टी का पर्याय बना दिया। रामविलास पासवान, जीतनराम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा का पूरा परिवार सत्ता की चासनी में डुबकी लगा रहा है। नीतीश कुमार को सत्ता की चासनी जहर लगती थी और आज जब पार्टी का अस्तित्व दांव पर दिख रहा है तो उसी जहर को अमृत समझकर गटक गये।
परिवार घाट की राजनीति
लालू यादव ने राजनीति की धारा में एक घाट बनाया था। उसका नाम है परिवार घाट। जब भी मौका आया, उस घाट पर पत्नी, बेटा, बेटी से लेकर रिश्तेदार तक को डुबकी लगवाते रहे।
डाॅ लोहिया इसी परिवार घाट की धारा के खिलाफ थे। नीतीश भी इसका विरोधी रहे। लेकिन पासवान, मांझी और कुशवाहा के परिवार घाट से नीतीश को कभी कोई एतराज नहीं हुआ। उन्हें सिर्फ लालू यादव के परिवार घाट पर आपत्ति थी। लालू यादव ने 30 साल पहले समझ लिया था कि क्षेत्रीय पार्टियों की आत्मा परिवार में बसती है। इसलिए कभी भी दूसरे नेता को पार्टी में पनपने नहीं दिया।
2005 में रामविलास पासवान मुस्लिम मुख्यमंत्री की शर्त पर राजद को समर्थन देने को तैयार थे तो लालू यादव ने सिरे से खारिज कर दिया था। 2013-14 में रामविलास पासवान को संसदीय दल का नेता बनाने की बारी आयी तो अपने बेटे को बनावाया।
जीतनराम मांझी ने अपने बेटे को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया। उपेंद्र कुशवाहा को भी मंत्री चुनने की बारी आयी तो बेटे को सबसे योग्य माना। भाजपा को भी जब राष्ट्रीय अध्यक्ष चुनने की बारी आयी तो एक पूर्व विधायक के बेटे नितिन नवीन को ही राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया।
समाजवाद और पुत्र मोह
खुद को समाजवाद के सबसे बड़े ध्वजवाहक समझने वाले नीतीश कुमार को लालू यादव के 30 साल बाद समझ में आया कि पार्टी को चलाने के लिए बेटा का होना जरूरी है। यह समझदारी किसी उपदेश से नहीं आया है, बल्कि जब जदयू में नेतृत्व का संकट आया तो बात समझ में आयी।
नीतीश कुमार ने जीतनराम मांझी और आरसीपी सिंह पर भरोसा किया था, लेकिन दोनों आस्तीन के सांप निकले। संजय झा, ललन सिंह या विजय चौधरी सत्ता की मलाई के लिए वफादार हो सकते हैं, लेकिन ईमानदार नहीं। इसलिए कार्यकर्ताओं को झा, सिंह या चौधरी स्वीकार्य नहीं। बात घुम-फिरकर निशांत पर आती है और वहीं ठहर जाती है।
निशांत की योग्यता, सक्षमता या डिग्री पर हम कोई बहस नहीं कर रहे हैं। उनकी सबसे बड़ी योग्यता, सक्षमता या डिग्री है कि वे नीतीश कुमार के पुत्र हैं।
पुत्र मोह हर बाप को होता है। धृतराष्ट्र तो सिर्फ बदनाम रहा है। पुत्र के लिए नीतीश कुमार ने जो किया है, वह आम भारतीय परिवार की दास्तां है। पुत्र मोह में विचारधारा की बलि कोई नयी बात नहीं है। लालू यादव ने तीस साल पहले परिवार को ही विचार समझ लिया था और नीतीश कुमार को यह समझने में तीस साल लग गये।
नीतीश कुमार जब समाजवाद का पिंडदान कर रहे हैं, तब पुत्र को 85 सदस्यीय विधायक दल की पूंजी छोड़कर जा रहे हैं। सांसद, विधायक, विधान पार्षदों का भरा-पूरा परिवार है। अब वे मार्गदर्शक की भूमिका में होंगे। लेकिन यह मार्ग समाजवाद का होगा या संघवाद का, यह उनके राज्यसभा जाने के लिए तैयार होने के साथ ही तय हो गया था।
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- अंकिता कुमारी पत्रकारिता की छात्रा हैं। वर्तमान में वह संजीवनी समाचार डॉट कॉम के साथ इंटर्नशिप कर रही हैं और समाचार लेखन व फील्ड रिपोर्टिंग में सक्रिय रूप से जुड़ी हुई है।
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