सारण के अंशुल ने मिट्टी रहित तकनीक से खेती कर दिखायी नई राह, तैयार किया पहला फार्मिंग सेटअप

छपरा
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छपरा। बदलते समय के साथ जहां युवा वर्ग सरकारी नौकरी या फिर कॉर्पोरेट के पीछे भागता दिखाई पड़ता है। वहीं, छपरा के एक युवा ने खुद को खेतों की मिट्टी से ‘हाथ आजमाना’ सही समझा। छपरा से कुछ दूर स्थित नगरा के सिसवा रसूलपुर निवासी अंशुल सिंह अपने गांव में रहते मिट्टी रहित खेती यानी बिना मिट्टी की खेती कर रहें है। अंशुल मिट्टी रहित तकनीक से सारण में नया आयाम गढ़ने के साथ ही समाज के हर उस व्यक्ति के लिए मिसाल पेश कर रहें हैं, जो खेती से दूर भागते हैं या जो खेती करने को छोटा काम समझते हैं। एक तरफ बाज़ार में मौजूद सब्जियों और फलों के उत्पादन में जहां पेस्टिसाइड, केमिकल और फ़र्टिलाइज़र का भरपूर उपयोग होता है, जिनके सेवन से कई बीमारियां हो सकतीं है। वहीं, अंशुल अपने फार्म में मिट्टी रहित तकनीक की मदद से ऐसी सब्जियों और फलों का उत्पादन कर रहें हैं, जिनमे किसी प्रकार का केमिकल और फ़र्टिलाइज़र का उपयोग नहीं होता है। खेती को एक सामाजिक सेवा भी मानने वाले अंशुल ने बताया कि मिट्टी रहित उत्पादन वाले सब्जियों को खाने से पोषण संबंधी वृद्धि होती है। साथ ही यह शरीर के लिए फायदेमंद होता है। इसके सेवन से बीमारियां नहीं होती हैं। बिना मिट्टी की तकनीक से गैर- मौसमी सब्जियों का उत्पादन प्रकृति के विपरीत जा कर भी किया जा सकता है।

सारण का पहला मिट्टी रहित फार्मिंग सेटअप

मिट्टी रहित फार्मिंग सेटअप तैयार करने वाले अंशुल सारण के पहले ऐसे युवा हैं, जिन्होंने इस दिशा में कदम बढ़ाया है। जहां लोग बड़े शहर को अपने रोजगार का साधन चुनते हैं। वही अंशुल अपने गांव में फार्मिंग कर रोजगार का नया उदाहरण प्रस्तुत करते हुए युवाओं की प्रेरणा बनने का काम कर रहें है। देश के दूसरे राज्यों में तेजी से इस तकनीक का प्रयोग कर बड़ी मात्रा में उत्पादन किया जा रहा है। उनका सपना है कि सारण में ऐसे और फार्मिंग सेटअप को स्थापित कर युवाओं को रोजगार देना।

कैसे होती है बिना मिट्टी फार्मिंग?
यह खेती एक पॉलीसिस्टम में की जाती है। इसमें विशेष पॉलिथीन शीट का उपयोग किया जाता है। जिसके तहत नियंत्रित जलवायु परिस्थितियों में फसलें उगाई जाती हैं। साथ ही छोटे छोटे बैग में कोकोपीट (नारियल का बुरादा) भरा जाता है। ड्रिप इरिगेशन के माध्यम से पौधों तक न्यूट्रिशन पहुंचाया जाता है, जिस वजह से पौधे खड़े रहते है। यह पूरा सिस्टम कंट्रोल कल्टीवेशन के तहत होता है, जिसमें करीब 70 फीसदी ही सूर्य की किरण पौधों पर पड़ती है।

मिट्टी रहती फार्मिंग करने का आईडिया कहां से आया?

जब अंशुल से उपरोक्त सवाल किया गया तो उन्होंने बताया कि दसवीं कक्षा में ही खेती को लेकर दिलचस्पी जागृत हो हुई थी। बाज़ारों में गैर मौसमी सब्जियों को देख कर मन में कई सारे सवाल पैदा होते थें। इस के बारे में पता करना शुरू किया। एग्रीकल्चर से बैचलर डिग्री प्राप्त होने के बाद मैंने अपने गांव में ही मिट्टी रहित तकनीक का फार्मिंग सेटअप तैयार किया। अमूमन खेती में कई बार पौधों में कीड़े लग जाने से उनमें बीमारियां हो जाती हैं। जिस वजह से फसल नष्ट हो जाते हैं। यही कारण है कि कई बार किसान भाई अच्छी पैदावार नहीं दे पातें। साथ ही उन्हें मौसम पर निर्भर होना पड़ता है। मिट्टी रहित फार्मिंग में प्रकृति पर निर्भर होनी की जरूरत नहीं होती। इस तकनीक के माध्यम से खेती करने में पैदावार अच्छी होती है और कोई खतरा भी नहीं होता।

कब से इस तकनीक से खेती कर रहें हैं ?

मिट्टी रहित तकनीक से खेती करने के लिए एक फार्मिंग सेटअप लगाने में कुछ वक्त लगता है। फिलहाल दो महीने पहले जो मैंने बीज डाला था, वो पौधे अब पुष्पन और फलने की अवस्था में आ गये हैं। इस तरीके की खेती के लिए जलवायु पर ज्यादा निर्भर नहीं होना पड़ता है। फार्मिंग के लिए ज्यादा जगह की जरूरत भी नहीं पड़ती है। आप चाहे तो किसी भी मौसम में मनचाहा फसल की पैदावार कर सकते हैं।

भविष्य को लेकर क्या प्लान है ?
उन्होंने कहा कि पढ़ाई खत्म होते ही इंटर्नशिप के दौरान जॉब ऑफर हुआ था। लेकिन मुझे अपने गांव को ही आर्थिक रूप से मजबूत बनाना है। फार्मिंग सेटअप के लिए घर से पिताजी और बड़े भाई का काफी सहियोग मिला। आज मैं अपने फार्म से ऐसे पौधों का उत्पादन कर रहा हूं,जो रोगमुक्त और उच्च पोषक तत्व वाले हैं । इसके सेवन से बीमारियां नहीं होती हैं। भविष्य में वैसे सब्जियों और फलों के उत्पादन पर ज्यादा ध्यान केंद्रित रहेगा, जो गैर – मौसमी है। बाजार में इसकी डिमांड काफी रहती है। ऐसे में बाजार की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पैदावार करने की प्लानिंग है। फिलहाल मैंने फार्म में कैप्सिकम और टमाटर के पौधे लगाए हैं।