मोबाइल नेटवर्क में सुधार से ही अर्थव्यवस्था का होगा बेड़ा पार: राजन एस मैथ्यूज

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वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश चालू वित्त वर्ष के केंद्रीय बजट में दूरसंचार उद्योग से राजस्व के लक्ष्य को बढ़ाकर 50,519 करोड़ रुपये कर दिए हैं। दूरसंचार उद्योग पहले से वित्तीय दबाव का सामना कर रहा है। ऐसे में सेल्यूलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीओएआई) के महानिदेशक राजन एस. मैथ्यूज से उद्योग की वस्तुस्थिति के बारे में पांच सवाल किए, जो इस प्रकार हैः

1. सवालः केंद्रीय बजट 2019 में दूरसंचार उद्योग के लिए क्या है?
उत्तरः केंद्रीय बजट, 2019-20 में दूरसंचार उद्योग के लिए कुछ भी अच्छा नहीं है। बजट में कृत्रिम मेधा (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी), 5जी, 4जी, सारे गांवों को डिजिटल प्रणाली से जोड़ने जैसी सारी अच्छी चीजों की चर्चा है। डिजिटल भुगतान, ई-वाणिज्य, नकदी के इस्तेमाल में कमी लाने की बात है। ये सारे काम नेटवर्क के जरिए ही तो होंगे, डिजिटल नेटवर्क के जरिए। अगर डिजिटल नेटवर्क ही बुरी स्थिति में होगा तो ये सारी चीजें कैसे मुमकिन होंगी। अगर आपके पास अत्याधुनिक कार हो लेकिन अच्छी सड़क ना हो तो उसका क्या फायदा। नेटवर्क भी एक हाईवे की तरह है, जो बहुत अच्छी स्थिति में नहीं है।

जहां तक बजट का सवाल है, हमने लाइसेंस शुल्क, स्पेक्ट्रम शुल्क और जीएसटी में कमी का आग्रह किया था। इनमें से कुछ भी नहीं हुआ। मेरे ख्याल से यह उद्योग के लिए अच्छी खबर नहीं है क्योंकि अगर राजस्व में थोड़ी-बहुत स्थिरता आ जाती है और प्रदर्शन में कुछ सुधार भी होता है तो भी कोई खास लाभ नहीं होगा। ऐसा इसलिए कि उद्योग काफी अधिक समस्याओं से जूझ रहा है और 7.6 लाख करोड़ रुपये कर्ज में है। जब तक आय में उल्लेखनीय वृद्धि नहीं होती है, जो निकट भविष्य में होता नहीं दिख रहा है। ऐसे में सरकार को दूरसंचार कंपनियों को होने वाली एक रुपये की कमाई में से 30 पैसे लेने की परंपरा को जारी नहीं रखना चाहिए। ऐसा इसलिए कि कंपनियों के पास नकदी का काफी अभाव है। हम दूरसंचार सेवा प्रदाताओं के राजस्व में बहुत अधिक परिवर्तन होता हुआ नहीं देख रहे हैं। यहां तक कि जियो को भी निधि जुटाना पड़ रहा है। दूरसंचार सेवा प्रदाता धन जुटाने के लिए अपनी परिसंपत्तियों की बिक्री कर रहे हैं। इसलिए उद्योग सरकार से शुल्कों में कटौती का अपना आग्रह दोहराता है।

2. सवालः सरकार ने वित्तीय संकट से जूझ रहे दूरसंचार क्षेत्र से 2019-20 में राजस्व का लक्ष्य बढ़ाकर 50,519 करोड़ रुपये कर दिया है। क्या आपको यह व्यवहारिक लगता है? उद्योग की क्या राय है?

उत्तरः पिछले साल के मुकाबले राजस्व लक्ष्य में वृद्धि के कारण अब तक स्पष्ट नहीं हो सके हैं। ऐसा नहीं लगता कि नीलामी (5जी और अन्य बैंड के स्पेक्ट्रम की नीलामी) से इतने रूपये आने वाले हैं। संभव हो कि सरकार को इस बात की उम्मीद हो कि उद्योग पटरी पर लौटेगा और ज्यादा राजस्व अर्जित करेगा। लेकिन अभी ये सब केवल अटकलें हैं। स्पेक्ट्रम एवं लाइसेंस शुल्क से 21,000 करोड़ रुपये की प्राप्ति की उम्मीद है। बाकी 27,000 करोड़ रुपये के कर्ज का भुगतान होना है, जो कि होगा लेकिन ये ईएमआई के तरह का भुगतान होता है। ऐसे में बढ़ा हुआ लक्ष्य कैसे हासिल होगा यह स्पष्ट नहीं है। लेकिन तमाम चीजों को ध्यान में रखते हुए चालू वित्त वर्ष में हमें राजस्व में कोई उल्लेखनीय वृद्धि होता हुआ नहीं दिख रहा।

3. सवालः बजट में सरकार दूरसंचार उद्योग के लिए क्या उपाय करने से चूक गयी?

उत्तरः मेरे ख्याल से उद्योग को प्रोत्साहन प्रदान करने का अवसर सरकार के पास था। हम लोग उम्मीद कर रहे थे कि शुल्क का बोझ कुछ कम जाएगा, जिससे राजस्व में थोड़ी बढ़ोत्तरी होती। कंपनियां अपनी सेवाओं को बेहतर बनाने में निवेश करतीं, जिससे आखिरकार देश के आम उपभोक्ताओं को ही लाभ होता। मेरे ख्याल से सरकार ने उद्योग में नयी जान फूंकने का अवसर गंवा दिया है।

हमने 5जी को अपनाने के लिए स्पेक्ट्रम शुल्क कम करने का आग्रह किया था। पूरा विश्व 5जी को अपनाने के लिए पूरे जोर-शोर से काम कर रहा है। भारत में भी ऐसा किया जाना है। स्पेक्ट्रम इस पूरी प्रक्रिया का अहम हिस्सा है। ऐसे में लगता है कि भारत एक बार फिर एक बड़ा मौका गंवाने वाला है, अगर स्पेक्ट्रम की आधार कीमतें ट्राई की अनुशंसा के मुताबिक ही रहती हैं तो। ट्राई ने थोड़े दिन पहले ही अपनी सिफारिशों की समीक्षा से इनकार कर दिया, जो पूरी तरह समझ से परे है।

मुझे लगता है कि सरकार ने हस्तक्षेप नहीं किया तो इस क्षेत्र की स्थिति भी जेट की तरह हो जाएगी। देखिए, कितनी कंपनियां खत्म हो गयीं। हमारे पास 13 कंपनियां थीं, आज तीन निजी एवं एक सरकारी कंपनी बची है। आरकॉम और टाटा जैसी बड़ी कंपनियों का मोबाइल कारोबार खत्म हो गया। एयरसेल का मामला एनसीएलटी में चल रहा है। किसने सोचा था कि एयरसेल का मामला एनसीएलटी में चला जाएगा। ऐसे में और क्या सबूत चाहिए कि यह उद्योग संकट में है।

4. सवाल: सरकार की तरफ से किस तरह की नीतिगत पहल की उम्मीद दूरसंचार उद्योग कर रहा है।

उत्तरः अगर आप राष्ट्रीय डिजिटल संचार नीति (एनडीसीपी) की 2018 की रपट पर ध्यान दें तो उसमें कहा गया है कि आपको इस उद्योग को धन निकालने वाले उद्योग की तरह देखना बंद करना होगा। बल्कि इसका पोषण किया जाना चाहिए, क्योंकि जीडीपी पर इसका असर साफ देखने को मिलता है। अभी यह छह प्रतिशत पर है, जो आसानी से 12 प्रतिशत पर पहुंच सकता है। अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पांच हजार अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के सपने को साकार करना है तो हम लोग इसमें सबसे अधिक सहायक साबित हो सकते थे। स्पष्ट तौर पर कुछ भी नहीं हो सका है। ऐसे में दोहरे कराधान को खत्म किया जाना चाहिए। इस चीज को समझिए कि 2001 में राजस्व साझा करने पर सहमति बनी लेकिन 2012 में माननीय उच्चतम न्यायालय ने स्पेक्ट्रम को अनिवार्य करने की बात कही। उसके बाद राजस्व साझा किये जाने की परंपरा खत्म होनी चाहिए थी। ऐसा नहीं हुआ। ये परंपरा खत्म होनी चाहिए।

जीएसटी को देखिए। स्पेक्ट्रम लेने के लिए कंपनी सरकार से ऋण लेती है और ईएमआई के जरिए उसका भुगतान करती है। कर्ज का भुगतान करने के लिए दिये जाने वाले ईएमआई पर 18 प्रतिशत की जीएसटी का भुगतान करना होता है। एसयूसी के भुगतान पर भी 18 प्रतिशत का ब्याज देना होता है। लाइसेंस फी के भुगतान के लिए भी 18 प्रतिशत जीएसटी देना पड़ता है। दुनिया में कहीं भी ऐसा नहीं होता।

5. सवाल: हाल में कर्नाटक सरकार ने स्कूलों, धार्मिक स्थलों और अस्पतालों के 50 मीटर के दायरे में टावर लगाने पर प्रतिबंध लगा दिया है, वहीं राजस्थान सरकार ने टावरों को नियमित करने के संदर्भ में 2012 की नीति को अपने का फैसला किया। साथ ही टावर लगाने के शुल्क में भी कुछ राज्यों द्वारा वृद्धि की गयी है। संगठन की इस विषय पर क्या राय है?

उत्तरः दरअसल, अक्सर ये चर्चाएं सुनने को मिलती हैं, जो निरर्थक हैं। देश के आठ उच्च न्यायालयों ने कहा है कि भारत में टावरों को लेकर अपनाये गए सुरक्षा मानक बिल्कुल सुरक्षित हैं। सबके लिए। ऐसे में किसी क्षेत्र, स्थान या व्यक्ति को इसके दायरे से बाहर रखने की कोई जरूरत नहीं है।

दरअसल, हर राज्य नकदी के संकट से जूझ रहा है और शुल्क बढ़ाये जाने का फैसला इसी से जुड़ा है। शुल्क बढ़ाने के संदर्भ में संगठन का कहना है कि इससे आखिर में राज्य को ही घाटा होगा क्योंकि हमने पाया है कि जहां डिजिटल नेटवर्क की अच्छी स्थिति होती है, वहां अर्थव्यवस्था में सुधार होता है। इससे वहां के लोगों के जीवन स्तर में सुधार आएगा। ये सारी चीजें एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।

Ganpat Aryan

Ganpat Aryan

Multimedia Journalist

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