सफरनामा: दिल में बसी दिल्ली की यादें…

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दिलदारों का शहर दिल्ली, जहां की आबोहवा आपको खुद ही दिल्ली का बना देती है। इसकी बोली, इसका खाना और इसका बेफिक्र अंदाज आपके जेहन में एक कभी न भूल पाने वाली छाप छोड़ देता है। भले ही ये मुलाकात बस कुछ दिनों की रही हो पर हमारे यादों के खजाने में कुछ बेहतरीन पलों का इजाफा कर गई।

दिल्ली में अपना ठिकाना नारायणा विहार में था।मैं अपने दीदी के यहां ठहरे थे। गुरुवार को दोस्तों के साथ इंडिया गेट जाने की प्लान बना। फिर हम लोग अपने-अपने जगहों से निकलकर इंडिया गेट पहुँचे। करीब तीन साल बाद कॉलेज के दोस्तों से मुलाकात हुई। इंडिया गेट पर हमने सुकून को जीभर जीने के लिए काफी वक्त बिताया। चिड़िया घर वहां से कुछ ही दूरी पर है। इंडिया गेट को जीभर के निहारने के बाद हम चिड़िया चल पड़े।

लालकिला भी देखने में काफी खूबसूरत है। लाल पत्थरों से बना और बेहतरीन कारीगरी से सजे लालकिला को देखकर हमें यह एहसास हो गया था कि क्यूं इसे दिल्ली की शान कहा जाता है। ऐसा नहीं कि इंडियागेट और लालकिला जैसा सुकून सारी दिल्ली में पसरा रहता है।

अगले दिन जब हमने शॉपिंग के लिए दिल्ली की मार्केट्स का रुख किया तो हमें दिल्ली की असली रौनक का नजारा दिखा। हम पहले राजीव चौक गए जहां हमने खाने-पीने के साथ शॉपिंग का शौक भी पूरा किया। वहां लगभग सारे ब्रैंड्स की चीजें मिलती हैं। उसके बाद हम चांदनी चौक गए। दिल्ली की सबसे पुरानी बाजार के नाम से मशहूर चांदनी चौक पर भले ही पुरानी होने का तमगा लगा हो पर इसकी रौनक में कोई कमी नहीं आई। शाम जैसे-जैसे रात से मिलती जाती है इन बाजारों की रौनक भी अपने शबाब पर पहुंचती जाती है। हालांकि दिल्ली से हमारी मुलाकात का वक्त धीरे-धीरे खत्म हो रहा था पर हमारे मन में उसे छोड़कर जाने का ख्याल भी नहीं आ रहा था। खैर अगले दिन हम दिल्ली को अपने दिल में बसाए छपरा वापसी के लिए चल दिए।

दिल्ली से लौटकर गणपत आर्यन

 

Ganpat Aryan

Ganpat Aryan

Multimedia Journalist

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