विधानसभा में आखिरी दिन सत्‍ता और विपक्ष के बीच हुई तीखी तकरार

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– राजद के प्‍ले बोर्ड में भाजपा का चुनाव चिह्न कमल बना कौतूहल

@संजीवनी रिपोर्टर
पटना : सत्रहवीं विधान सभा की पहली बैठक पांच दिनों की कार्यवाही के बाद अनिश्चित काल के लिए शुक्रवार को स्‍थगित कर दी गयी। विधान मंडल की अगली बैठक अब अगले साल फरवरी महीने में बजट सत्र के रूप में होगी। पांच दिनों में पहला दो दिन शांतिपूर्ण संपन्‍न हो गया, जबकि अंतिम तीन दिन हंगामें की भेंट चढ़ गया। आखिरी दिन सत्‍ता और विपक्ष के बीच बहस मर्यादा लांघती हुई दिखी।

अंतिम दिन कार्यवाही शुरू होने के एक घंटा पहले पहुंच गये। विधान सभा चुनाव में साथ-साथ लड़ने वाले राजद, कांग्रेस और वामपंथी दलों के बीच विभाजन साफ-साफ दिखा। सदन की कार्यवाही के पहले विपक्षी दलों की ‘नौटंकी’ का मजमा लगने लगा था। पहले वामपंथी पार्टियों की टीम पहुंची और नारेबाजी शुरू हुई। इसके बाद राजद की टीम पहुंची। इन लोगों ने अपना झंडा अलग गाड़ दिया। संख्‍या बड़ी है, इसलिए कतार बड़ी हो गयी। एक के पीछे एक लोग खड़े हो गये, लेकिन राजद के प्‍ले बोर्ड (जिसे तख्‍ती भी कह सकते हैं) में भाजपा का चुनाव चिह्न कमल बना हुआ था। कमल छाप प्‍ले बोर्ड देखकर समझ में नहीं आ रहा था। आखिरकार राजद के लोग भाजपा का समर्थन करने के लिए जुटे थे या नीतीश कुमार का विरोध करने के लिए ? विधान सभा परिसर में राजद और वामपंथी दलों के बीच आपस में मुख्‍य ‘कार्यशील’ विपक्षी दल बनने की होड़ लगी रही। वैसे राजद वाले लगभग सभी विधायक ‘मालधारी’ हैं, इसलिए पार्टी का झंडा और संगठन का झोला उनके लिए कोई मायने नहीं रखता है, जबकि वामपंथी दलों की पहचान ही झंडा है।

लालू लीला लेकर पहुंचे थे मोदी

करीब 24 साल बाद सुशील मोदी ‘बेकोना’ हुए हैं। 1996 में‍ श्री मोदी विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष बने थे। तब से वे लगातार (लोकसभा सदस्‍यता की कुछ अवधि को छोड़कर) कोने के आस-पास बैठते रहे हैं। नेता प्रतिपक्ष, भाजपा‍ विधायक दल के नेता या उपमुख्‍यमंत्री के रूप में उन्‍हें सत्‍ता या विपक्ष का बड़ा ओहदा मिलता रहा है। इस कारण सदन में पहली पंक्ति में आसन के सबसे करीब की सीट मिलती रही थी। लेकिन अभी वे सदन में एक सामान्‍य सदस्‍य हैं। विधान परिषद में भाजपा ने अपना नेता नहीं चुना है। इस कारण से आसन और उनकी सीट में काफी दूरी थी, लेकिन लालू यादव के प्रति उनका ‘प्रेम’ कम नहीं हुआ है। कार्यवाही के दौरान भी उनकी टेबुल पर ‘लालू लीला’ नामक पुस्‍तक रखी हुई थी।

इस पुस्‍तक के लिए लालू यादव विरोधी दस्‍तावेजों और आंकड़ों का संकलन सुशील मोदी ने ही किया था और इसके संपादक भी वही है।

सेंट्रल हॉल में अटपटा लग रहा था कार्यवाही का संचालन

विधान मंडल के विस्‍तारित भवन में बने सेंट्रल हॉल में विधान सभा की कार्यवाही का संचालन अटपटा लग रहा था। खासकर पत्रकारों के लिए। पुराने भवन में सदन की बनावट यू-आकार की है। सत्‍ता पक्ष और विपक्ष के नेता आमने-सामने बैठते हैं। सदन के पिछले हिस्‍से के ऊपरी भाग में प्रेस दीर्घा बना हुआ है। इस कारण दोनों पक्षों के नेताओं के भाषणों के साथ उनकी भाव-भंगिमा को भी पढ़ा जा सकता है। सेंट्रल हॉल में पत्रकार दीर्घा और सदन के बीच शीशा लगा हुआ है। टीवी स्‍क्रीन पर सदन की कार्यवाही दिखायी देती है। पत्रकार दीर्घा में दो टीवी स्‍क्रीन लगे हैं। एक पर स्‍टील एंगल आता है, जो हॉल के पीछे लगे कैमरे के माध्‍यम से दिखता है। इसमें सिर्फ स्‍पीकर का चेहरा दिखता है और सदस्‍यों की पीठ दिखती है।

दूसरे कैमरे में सिर्फ वक्‍ता का चेहरा नजर आता है। बाकी सदन की गतिविधि नजर नहीं आती है। इस कारण सदन की कार्यवाही के दौरान ‘मुर्गा लड़ाई’ का आनंद दर्शकों को नहीं मिलता है। इसलिए अटपटा लगता है। यदि सत्र की कार्यवाही सेंट्रल हॉल में चल रही हो तो, प्रेस दीर्घा में तीसरा टीवी स्‍क्रीन भी लगाया जाना चाहिए, जिसमें सदन के अन्‍य सदस्‍यों की गतिविधि चेहरे के साथ नजर आये।

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