वित्तरहित शिक्षण संस्थानों में नामांकन की शीघ्र अनुमति दें सरकार : प्रो रणजीत

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@संजीवनी रिपोर्टर
छपरा : जयप्रकाश विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर शिक्षक संघ के सचिव सह सम्बद्ध महाविद्यालय शिक्षक संघर्ष समिति के संरक्षक व सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के प्रत्याशी प्रो रणजीत कुमार ने वित्त रहित शिक्षण संस्थानों में इंटर में नामांकन पर रोक की कङी आलोचना की है कहा है कि बिहार विद्यालय परीक्षा समिति का यह आदेश पूरी तरह से अव्यवहारिक , अदूरदर्शी , अतार्किक तथा तानाशाहीपूर्ण है। प्रो कुमार ने इस संबंध में बिहार के शिक्षा मंत्री को ईमेल से पत्र भेजा है और वित्तरहित शिक्षण संस्थानों को इंटर में नामांकन लेने की तत्काल अनुमति देने की मांग किया है। समिति ने इंटरमीडिएट में नामांकन हेतु अपने ओ एफ एस एस वेबसाइट पर जितने शिक्षण संस्थानों की सूची जारी किया है, उसमें सम्बद्ध इंटर एवम डिग्री कॉलेजों का नाम ही नहीं है। इसका मतलब हुआ कि 597 अनुदानित इंटर और डिग्री कॉलेज सत्र 2020-22 में इंटर में नामांकन नहीं ले सकेंगे। इस निर्णय का आधार यह बताया गया है कि इन वित्तरहित शिक्षण संस्थानों की संबद्धता अवधि समाप्त हो चुकी है और समिति के पी आर –417/2019 द्वारा इन शिक्षण संस्थानों को अपना अभिलेख जांच हेतु समिति में जमा करने का आदेश दिया गया था । समिति के ही अनुसार अक्टूबर 2019 से अब तक 487 शिक्षण संस्थानों ने जांच हेतु अपने अभिलेख समिति को उपलब्ध करा दिए हैं, लेकिन अभी तक जांच कार्य पूरा नहीं हुआ है। समिति के इस तुगलकी फरमान से सरकार की नीति एवं नीयत पर तो सवाल खड़े हो ही रहे हैं । इसमें सियासत की भी बू आ रही है। उन्होंने सवाल किया कि सरकार ने जब इन शिक्षण संस्थानों को स्थायी या अस्थायी संबद्धता प्रदान किया था तो, क्या इन संस्थानों का भौतिक निरीक्षण एवं संबंधित अभिलेख की जांच नहीं की गई थी?यह जांच के नाम पर बार बार शोषण, दोहन एवम मानसिक यंत्रणा क्यों?
समिति के अनुसार ही 487 शिक्षण संस्थानों ने जांच हेतु अपने अभिलेख समर्पित किये हैं। अक्टूबर 2019 से जून 2020 तक एक भी शिक्षण संस्थान के अभिलेखों की जांच पूरी नहीं हो पायी तो, क्या समिति की कोई जवाबदेही नहीं है? क्या समिति के रहनुमाओं की नीति एवं नीयत सवालों के घेरे में नहीं है? दर्जनों वैसे शिक्षण संस्थानों को भी नामांकन लेने से वंचित कर दिया है, जिन्हें बिहार सरकार से स्थायी संबद्धता हासिल है।उदाहरणार्थ सारण जिले के लोक महाविद्यालय हाफिजपुर को शिक्षा विभाग के पत्रांक 1065 दिनांक 19-12-1989 द्वारा इंटर स्तर तक स्थायी संबद्धता प्राप्त है। यह तथ्य या तो, समिति के अधिकारियों को मालूम नहीं है या फिर दवाब की राजनीति का हिस्सा है और समिति का राजनीतिक मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
सरकार एक सुनियोजित रणनीति एवम योजना के तहत वित्तरहित शिक्षण संस्थानों को बंद करना चाह रही है। पहले सीट वृद्धि वापस लिया गया, फिर प्रत्येक पंचायत में मध्य विद्यालय को अपग्रेड कर इंटर तक की पढ़ाई का आदेश निर्गत किया गया और अब दशकों से कार्यरत शिक्षण संस्थानों को जांच के नाम पर नामांकन से वंचित किया जा रहा है।जब छात्रों का नामांकन ही नहीं होगा तो परीक्षाफल आधारित अनुदान कहाँ से मिलेगा?
सरकारी नवसृजित प्लस टू विद्यालयों को नामांकन की पूरी छूट दी गई है जबकि वहाँ शिक्षक एवम संसाधन दोनों की कमी है।ऐसे में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का सरकारी दावा ढकोसला ही साबित होगा। जिन पंचायतों में पहले से संबद्ध उच्चतर माध्यमिक विद्यालय कार्यरत है, वहाँ मध्य विद्यालय को अपग्रेड करने का निर्णय अनुचित एवम अव्यवहारिक है।बेहतर होता कि जिन संबद्ध माध्यमिक, उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों की अधःसंरचना सरकारी मानक के अनुरूप है। उसका अधिग्रहण कर लिया जाता। इससे सरकार को भूमि, भवन तथा अनुभवी शिक्षक भी मिल जाता। बिहार में 50 % से अधिक विद्यार्थी इन वित्तरहित शिक्षण संस्थानों में पढ़ते रहे हैं। बोर्ड के इस अव्यवहारिक निर्णय से नामांकन से वंचित छात्रों का पलायन तो बढ़ेगा ही,इन संस्थानों में कार्यरत 50 हजार शिक्षकों एवम कर्मचारियों का भविष्य भी अधर में लटक जाएगा ।
बिहार में 4 शिक्षक एवं 4 स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का जल्द ही चुनाव होने वाला है। समिति ने खुद इन शिक्षण संस्थानों की सूची मुख्य निर्वाचन अधिकारी को समर्पित किया है और इन संस्थानों के शिक्षकगण बड़ी संख्या में मतदाता भी बने हैं। विधान परिषद के आसन्न चुनाव को देखते हुए समिति के इस निर्णय के पीछे गहरा सियासी निहितार्थ दिखाई पड़ता है। इस चुनाव में सरकार के बहुत करीबी लोग भी मैदान में हैं। सरकार समर्थित-संरक्षित उम्मीदवारों को क्षेत्र भ्रमण के दौरान जमीनी हकीकत का पता चल चुका है कि नियोजित एवम वित्तरहित शिक्षक गण उनके क्रियाकलापों से नाराज हैं। इसलिए वित्तरहित शिक्षकों को प्रभावित करने का यह एक सुविचारित एवम सुनियोजित सियासी हथकंडा है। पहले जांच के नाम पर नामांकन पर रोक लगाओ, फिर शिक्षा मंत्री, मुख्यमंत्री से मिलकर नामांकन पर लगी रोक को वापस कराओ तथा वित्तरहित शिक्षण संस्थानों को अहसास कराओ कि हमारी वजह से ही यह सम्भव हो पाया है। इसलिए चुनाव में मेरा समर्थन कीजिए। इस सियासी प्रपंच को सभी प्रबुद्ध शिक्षकगण बखूबी देख और समझ रहे हैं। समिति द्वारा इस तरह का निर्णय लेने से उसकी निष्पक्षता एवम विश्वसनीयता भी संदेहास्पद हो गई है।
प्रो कुमार ने शिक्षा मंत्री से आग्रह किया है कि समिति के निर्णय को रद्द कर सम्बद्ध शिक्षण संस्थानों को पूर्व की भांति अविलंब नामांकन की अनुमति प्रदान किया जाए तथा इन संस्थानों का सरकारीकरण करने की दिशा में सकारात्मक कदम उठाया जाए।

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