भारतीय राजनीतिक जीवन में दल बदल की समस्या

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@मोहित कुमार उपाध्याय (राजनीतिक विश्लेषक) 

राजनीतिक अर्थों में दल बदल का अर्थ किसी व्यक्ति का उस राजनीतिक दल को, जिसके टिकट पर वह निर्वाचित हुआ है, छोड़कर किसी अन्य दल में सम्मिलित हो जाना है। इस बात में कोई संदेह नहीं हैं कि दल परिवर्तन का मूल उद्देश्य सैद्धांतिक मतभेद न होकर राजनीतिक स्वार्थ ही अधिक रहा है।

 

1967 के आम चुनाव के पश्चात दल परिवर्तन की घटनाएं इतनी तेजी से घटित होना शुरू हुई कि वर्तमान में  इसने एक गंभीर राजनीतिक समस्या का रूप धारण कर लिया है और यह स्वस्थ लोकतांत्रिक संसदीय प्रक्रिया के मार्ग में बाधा बनकर खड़ी हो गई है।

दल परिवर्तन के संबंध में  आचार्य जे बी कृपलानी ने सटीक टिप्पणी करते हुए कहा हैं कि कांग्रेस पार्टी ने उस समय भी जब उसे विधानमंडल में पूर्ण बहुमत प्राप्त था, विधायकों को राजनीतिक पदों का लालच देकर अपने दलों को छोड़कर कांग्रेस में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित किया जिसका इस बात के अतिरिक्त कोई और कारण न था कि कांग्रेस अपनी सदस्यता संख्या को असीमित रूप से बढ़ाना चाहती है।

 

इससे स्पष्ट होता हैं कि भारत में प्रथम आम चुनाव के तुरंत पश्चात दल बदल की राजनीति का जन्म हो चुका था और इसका एक सीमा तक श्रेय तत्कालीन कांग्रेस पार्टी को देना अतिश्योक्तिपूर्ण न होगा। आज के समय में इस समस्या ने भारतीय राजनीति में  अपनी गहरी जड़ें जमा ली हैं जिसका तीव्र एवं समुचित  उपचार किये जाने की आवश्यकता है।

 

 

भारतीय संविधान के अनुच्छेद – 19(1)(सी) में सभी नागरिकों को संगम या संघ बनाने की स्वतंत्रता प्रदान की गयी है। इस संवैधानिक प्रावधान का लाभ उठाकर भारत में बहुदलीय लोकतांत्रिक प्रणाली की स्थापना की गई है।
भारतीय निर्वाचन आयोग(ईसीआई) में राजनीतिक दलों के नवीनतम  आंकड़ों के अनुसार देश में कुल 2293 राजनीतिक दल है। निर्वाचन आयोग में पंजीकृत  इन दलों में से 7 मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय और 59 मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय दल है। यह एक दुखद स्थिति हैं कि भारत में राजनीतिक दलों की संख्या निहित स्वार्थ के कारण कुकुरमुत्ते के समान लगातार बढ़ती जा रही हैं और इसी का परिणाम हैं कि दल बदल की राजनीति खूब उन्नति कर रही है।

 

 

भारतीय राजनीति में दल बदल की समस्या का कोई एक विशेष कारण न होकर अनेक कारण हैं – पहला, विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा निर्वाचन में किसी सदस्य का चयन उस सदस्य की दल के सिद्धांतों के प्रति निष्ठा एवं योग्यता के आधार पर न करके कुछ अन्य कारणों जैसे संबंधित सदस्यों की निर्वाचन में विजयी होने की संभावना,  आर्थिक लाभ, राजनीतिक पद मिलने की संभावना इत्यादि के आधार पर करते है। यही कारण हैं कि दल के सिद्धांतों में विश्वास एवं आस्था के न होने के कारण सदस्य अपने दल को छोड़कर किसी दूसरे दल में आसानी से सम्मिलित हो जाते है।

 

दूसरे, भारतीय आमजन का राजनीतिक दलों के सदस्यों द्वारा किये जाने वाले दल परिवर्तन के प्रति उदासीन रहना। यदि जनसाधारण द्वारा दल परिवर्तन करने वाले सदस्यों का विरोध और उन्हें समर्थन न दिए जाने की घोषणा की जाती तो शायद विधानमंडल या राजनीतिक दलों के सदस्य दल परिवर्तन के कार्यों को इतना आसानी से अंजाम न देते परंतु सामान्यता यह देखा गया हैं कि जनता भावुक होकर इन दल बदलुओं के प्रति अधिक सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाती है।

 

 

तीसरा, विभिन्न राजनीतिक दलों में आपसी गुटबंदी दल परिवर्तन का एक बड़ा कारण है। आर्थिक लाभ एवं राजनीतिक पदों को प्राप्त करने के लालच में ऐसे सदस्य गुटों में विभक्त होकर एक दूसरे के प्रति नये-नये षड्यंत्र रचते रहते है ताकि, नैतिक या अनैतिक, किसी भी ढंग से सत्ता को प्राप्त किया जा सकें।

 

 

चौथा, राजनीतिक दलों में नेतृत्व का किसी एक व्यक्ति विशेष के हाथों में केंद्रित होना। इससे ऐसे सदस्यों में जो उस राजनीतिक दल में लंबे समय से जुड़े होने के पश्चात् भी राजनीतिक या विधायी पदों से वंचित हैं, निराशा एवं असंतोष बढ़ जाता है और अपने भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए ऐसे सदस्य किसी दूसरे दल की अंगुली पकड़कर आगे बढ़ जाते हैं।

 

 

पांचवां और सबसे बड़ा कारण हैं – राजनीतिक पद और धन को प्राप्त करने की आंकाक्षा और इससे वंचित किये जाने पर उत्पन्न होने वाला असंतोष।

 

 

विभिन्न राजनीतिक दलों में होने वाले दल परिवर्तन के अध्ययन से स्पष्ट होता हैं कि अधिकांश सदस्यों ने सैद्धांतिक मतभेद के आधार पर दल परिवर्तन नहीं किया बल्कि राजनीतिक पद एवं आर्थिक लाभ को प्राप्त करने के लिए दल बदल रूपी इस थ्योरी की ओर अधिक आकर्षित हुए।

 

उल्लेखनीय हैं कि दल बदल की इस गंभीर समस्या से छुटकारा प्राप्त करने के लिए समकालीन विभिन्न राजनीतिक दलों की मांग पर राजीव गांधी की सरकार में संविधान (52 वां संशोधन) अधिनियम, 1985 के द्वारा स्थानों के रिक्त होने और संसद एवं राज्य विधानमंडलों की सदस्यता से निर्हरता के संबंध में संविधान के अनुच्छेद – 101, 102, 190, और 191 में संशोधन कर दिया गया और संविधान में एक 10वीं अनुसूची जोड़ दी गई जिसमें दल बदल के आधार पर निर्हरता के लिए कुछ विशेष उपबंधों का प्रावधान किया गया।

 

91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा 10वीं  अनुसूची से दलों के विभाजन के आधार पर निर्हरता से बचाव संबंधी प्रावधान हटा दिया गया परंतु दलों के विलय का उपबंध वर्तमान में सहज रूप में उपलब्ध है। इसके अंतर्गत दो या उससे अधिक विधानमंडल  दल अपनी कुल सदस्यता के दो तिहाई बहुमत से विलय का निर्णय ले सकते है।

इससे स्पष्ट होता हैं कि दल बदल निरोधक अधिनियम के प्रावधानों में ही दल बदल की संभावना मौजूद हैं जो कि नैतिकता के आधार पर उचित नहीं ठहरायी जा सकती हैं और यह प्रावधान एक सीमा तक दल बदल निरोधक कानून को कमजोर बनाने में ही अधिक सहायक सिद्ध हो रहा है। इससे व्यापक स्तर पर विधानमंडल के सदस्यों की खरीद फरोख्त यानि हाॅर्स ट्रेडिंग को बढ़ावा मिलता हैं जो एक स्वस्थ लोकतांत्रिक संसदीय व्यवस्था के लिए  उचित नहीं ठहराया जा सकता है। हाल के दिनों में विभिन्न राज्यों में  ऐसी कई घटनाएं देखने को मिलीं जिसमें राजनीतिक दल एक दूसरे पर हाॅर्स ट्रेडिंग का आरोप लगाते देखे गए।

 

इस दिशा में बेहतर कदम उठाते हुए अनुच्छेद – 75 और   164 एवं एक नया अनुच्छेद – 361ख जोड़कर संविधान में यह प्रावधान किया गया हैं कि दल बदल के कारण निर्हरित सदस्य मंत्री पद और किसी वैतनिक सरकारी पद पर नियुक्त नहीं किया जा सकता है।

 

1985 तक, भारतीय संविधान में राजनीतिक दलों का कोई उल्लेख नहीं था परंतु दल परिवर्तन की बढ़ती गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए दल बदल निरोधक अधिनियम लागू किया गया।  सैद्धांतिक तौर पर इस अधिनियम के उपबंध दल परिवर्तन को रोकने में उपयोगी जान पड़ते हैं परंतु व्यवहारिक रूप में इस अधिनियम की सबसे बड़ी कमी हैं कि यह बड़े स्तर पर होने वाले दल परिवर्तन को रोकने में उपयोगी साबित होता दिखाई नहीं पड़ रहा है।

यह अधिनियम निर्दलीय सदस्यों के आचरण को नियंत्रित करने में असफल साबित होता है। वहीं यह उन सदस्यों पर भी कड़ा नियंत्रण नहीं रख पाता जो सदन के अंदर तो अपने दल द्वारा जारी की गई व्हिप का पालन करते हैं, परंतु वह सदन के बाहर दलीय अनुशासनहीनता का परिचय देते है।

 

दल बदल निरोधक कानून की सबसे बड़ी विवादास्पद स्थिति हैं – सदस्यों की निर्हरता के संबंध में अध्यक्ष की निर्णायक भूमिका। ब्रिटेन के समान भारत में अध्यक्ष गैर दलीय व्यक्ति नहीं होता है। सदन के अंदर वह अपने दलीय हितों को परे रखकर निष्पक्ष रूप अध्यक्ष दायित्वों का निर्वहन करने का प्रयास करता हैं परंतु सदन के बाहर उसे दलीय गतिविधियों में भाग लेने से कानूनी तौर पर रोका नहीं जा सकता है।

 

इस संबंध में यह आशा व्यक्त की गई थी कि अध्यक्ष निष्पक्ष होकर इस अधिनियम को कार्यान्वित करने का प्रयास करेगा परंतु व्यवहार में यह उम्मीद सत्य साबित नहीं हुई और अधिकांश स्पीकरों ने अपने कर्तव्यों एवं दायित्वों का ठीक से निर्वाह न करते हुए संबंधित दल को लाभ पहुंचाने वाले निर्णय दिए।
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता हैं कि भले ही अध्यक्ष तटस्थ होकर निर्णय दें परंतु फिर भी उस पर पक्षपात का आरोप लगाया जा सकता है। ऐसे अवसरों पर न्यायिक उपचार अंतिम विकल्प शेष रह जाता है जो कि संविधान निर्माताओं की भावना अर्थात न्यायपालिका का विधायिका एवं कार्यपालिका से पृथक्करण, के विरुद्ध है।

 

अत: आवश्यकता इस बात की हैं कि सदस्यों की निर्हरता संबंधी इस विवादास्पद मामले में अध्यक्ष एवं न्यायपालिका को दूर रखा जाए ताकि स्पीकर जैसे उच्च पद की गरिमा को बिना कोई ठेस पहुंचाए बरकरार रखा जा सकें। वहीं सदस्यों की निर्हरता संबंधी मामलों पर निर्णय देने के लिए विधानमंडल के सदस्यों में से ही किसी एक ट्रिब्यूनल का गठन किया जाए जो निष्पक्षता एवं ईमानदारी से निर्णय दे सकें।

 

हाल के वर्षों में भारत में सत्तारूढ़ एवं विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा दल बदल निरोधक अधिनियम का जिस प्रकार दुरूपयोग किया गया उससे स्पष्ट होता हैं कि दल बदल, जो कि भारतीय राजनीतिक जीवन का अभिन्न अंग बन चुका हैं, को मात्र कानूनी आधार पर रोका नहीं जा सकता हैं।

 

इस समस्या से छुटकारा प्राप्त करने के लिए इस बात की आवश्यकता हैं कि दल बदल निरोधक कानून के प्रावधानों की कमजोरियों को दूर किया जाए और प्रति निर्वाचन भारत में बढ़ती जा रही राजनीतिक दलों की संख्या को सीमित किया जाए एवं विधानमंडल के सदस्यों में दलीय सिद्धांतों के प्रति वचनबद्धता, निर्वाचन क्षेत्र की जनता के प्रति कर्तव्यबोध, ईमानदारी एवं नैतिक दायित्व का भाव पैदा किया जा सकें।

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