बदलते परिवेश में शिक्षक और शिक्षार्थी

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(शिक्षक दिवस पर विशेष )

@दिलशाद सैफी 

समय का चक्र सदैव एक सा नहीं रहता विकसित और विकासशील बनने की दौड़ में हम सब इतने आगे बढ़ते गये की सभ्यता संस्कृति को पीछे छोड़ते चले गए । विद्यालय ही नहीं शिक्षा,शिक्षक शिक्षार्थी सभी में परिवर्तन देखने मिल रहा है।

“युगों-युगो से चला आ रहा गुरु-शिष्य का संबंध भी आज इस परिवर्तन की भेट चढ़ गया”।

किसी भी देश की आर्थिक,सामाजिक ,सांस्कृतिक विकास उस देश की शिक्षा पर निर्भर करता है।

जैसा कि विदित है शिक्षा “त्रिधुर्वी” पाठ्यक्रम है जो शिक्षा, शिक्षक और शिक्षार्थी से बनी है।

 

 

शिक्षा में शिक्षक की जितनी अहम भूमिका है उतनी शिक्षार्थी की।

प्राचीन काल में गुरू का स्थान बहुत महत्वपूर्ण था

क्योंकि गुरु के लिए शिक्षा साधना होती थी व्यवसाय नहीं। एक शिक्षक (गुरू) की शिक्षार्थी को आदर्श नागरिक बनाने में महती भूमिका रहती थी।

 

 

*”गुरु पारस को अन्तरो

जानत है सब संत

वह लोचन कंचन करे

ये करि लये महन्त”*।।

अर्थात -जिस तरह गुरु और पारस में अंतर होता है सब संत जानते है.. पारस लोहे को तो सोना ही बनाता है लेकिन गुरु अपने शिष्य को अपनी तरह महान बनाता या बनता हुआ ही देखना चाहता है ।

 

 

.#गुरू गोविंद दोऊ खड़े काके लागु पाय.

बलिहारी गुरू आपने गोविंद दियो बताय #

जब भगवान और गुरु साथ खड़े हो तो शिक्षार्थी बालक पहले गुरू का चरण छूता है कि धन्य हो गुरू आपका जिसने मुझे ये बताया जो आपके साथ खड़े है वो “भगवान ” है..।

“शिक्षक और शिक्षार्थी के मध्य रिश्ते का अंदाज़ा इस दोहे से लगाया जा सकता है” ।

 

 

प्राय: हम सब ने देखा है एक शिक्षार्थी पर उसके शिक्षक के जीवन का प्रभाव अधिक पड़ता है हर बालक शिक्षा प्रांगन से आ केवल और केवल अपने अपने शिक्षक की नकल करता है क्योंकि वह उन जैसा ही बनना चाहता है।

किंतु आज अधिकतर शिक्षक का स्थान” तकनीकी गुरू ” ने ले लिया है आज का विधार्थी अपने शिक्षक से अपनी समस्या सांझा नहीं करता अपितु “गूगल ” गुरू से पढ़ना और समझना चाहता।

 

 

प्रश्न उठता है आखिर क्यों….?

क्यों एक शिक्षार्थी अपने शिक्षक से पढ़ना नहीं चाहता तकनीकी शिक्षा और शिक्षक पर निर्भर है क्यों…क्योंकि आज के शिक्षक के पढा़ने का तरीका बदल गया है वो जितना हो कक्षा में कम और टयूशन में अधिक से अधिक बच्चों को पढ़ने को मजबूर करता है जो सम्पन्न परिवार से है वो तो टयूशन ले लेता है पर जो बच्चा आर्थिक रुप से कमजोर है वो कही न कही से तकनीकी का सहारा लेता है पढ़ने के लिए। और इसी तरह कई और वजह से शिक्षक के प्रति शिक्षार्थी का उदासीन रवैया सामने आता है।

 

 

आज शिक्षक के लिए शिक्षा एक व्यवसाय बन गया है और शिक्षार्थी माध्यम। शाला में बालक वहीं सिखता है जो देखता है आज जैसे शिक्षक की छवी देखी गई है वो बहुत ही विचारणीय है। पहले शिक्षक शिक्षार्थी से बहुत आत्मीयता से वार्तालाप करते थे उनकी समस्याओं को सुनते उसका समाधान करते सभी शिक्षार्थी से समान व्यवहार करते मगर अब वो प्रतिभाशाली शिक्षार्थी को बढ़ाने और कमजोर विधार्थी अनदेखा करते है।

उसी तरह से बच्चे भी आज समय से पहले बड़े और समझदार बनते जा रहे शिक्षक को ही बात-बात पे ज्ञान बांटने लग जाते है जो बहुत गलत है।पहले शिक्षक की छड़ी जिस बच्चे को पड़ जाती उसका जीवन सँवर जाता था मगर आज यदि एक शिक्षक छड़ी उठा दे तो बालक उसी पर टूट पड़ते है जो कि गलत है…।

एक शिक्षक अपने ज्ञान के प्रकाश से शिक्षार्थी के जीवन को प्रकाशित करता है। परंतु आज “द्रोणाचार्य, संदीपनी  जैसे महान गुरू नहीं रहे और न ही एकलव्य और अर्जुन की तरह आदर्श शिष्य”।

 

 

आज की युवा क्रान्तिकारी है जो समझौता नहीं करती किसी भी देश के राष्ट्र निर्मान में युवा पीढ़ी की अहम भूमिका है मगर भारत में स्थिति बहुत दयनीय है देश में हो रहे लगातार नैतिक एवं शैक्षणिक पतन से हमारे यु़वाओ में गहरा और प्रतिकुल प्रभाव पड़ा है।

आज देश की  शिक्षा व्यवस्था और शिक्षको की मौजूद

चिंतनीय दशा के लिए हमारी सरकारे सीधे तौर पर जिम्मेदार है जिसने  शिक्षक वर्ग को अपने हितो की पूर्ती का समान बना लिया है । इसी कारण शिक्षा में गिरावट आती गई।

 

 

आज सरकार को शिक्षा के गिरे स्तर को सुधारना होगा नयी नयी शिक्षानीति लागू करने से कुछ नहीं होगा।

स्कूल और शिक्षक में सुधार हो जाए तो शिक्षा और शिक्षार्थी दोनों में सुधार आ जाऐगा।

 

 

आज विद्यालय में विधार्थी शिक्षक से नहीं पढ़ते बल्कि शिक्षक को पढ़ते है। इसलिए इन दोनों को एक दूसरे के प्रति अपने अपने तरीके से सुधार की आवश्यकता है क्योंकि…! किसी देश की शिक्षा का स्तर शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों पर निर्भर करता है।

 

 

एक शिक्षक राष्ट्र निर्माता है प्रलय और निर्माण जिसके गोद में खेलती है और शिक्षार्थी को चाहिए की वो शिक्षको मान सम्मान देते हुए राष्ट्र हित में काम करे ।

जिला – महासमुंद, बसना

प्रदेश – छत्तीसगढ़

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