अनवरत विकास के लिए जरूरी हैं जनसंख्या नियंत्रण

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@पंकज भारती

किसी भी देश, भले ही वह विकसित हो या विकासशील, के लिए जनसंख्या विस्फोट एक बहुत बड़ी समस्या हो सकती हैं क्योंकि इसका सबसे ज्यादा प्रभाव संसाधनों की आपूर्ति पर पड़ता है। भारत की अगर बात करें तो हम एक प्रगतिशील देश के नागरिक है। निश्चित तौर पर हमारे संसाधन भी सीमित संख्या में मौजूद है। ऐसे में बढ़ती जनसंख्या एक बड़ी परेशानी का सबब बन सकती है। अनियंत्रित गति से बढ़ रही जनसंख्या देश के विकास को बाधित करने के साथ ही हमारे आम जन जीवन को भी दिन-प्रतिदिन प्रभावित कर रही है। विकास की कोई भी परियोजना वर्तमान जनसंख्या दर को ध्यान में रखकर बनायी जाती है, लेकिन अचानक जनसंख्या में इजाफा होने के कारण परियोजना का जमीनी धरातल पर साकार हो पाना मुश्किल हो जाता है। ये साफ तौर पर जाहिर है कि जैसे-जैसे भारत की जनसंख्या बढ़ेगी, वैसे-वैसे गरीबी का रूप भी विकराल होता जायेगा। महंगाई बढ़ती जायेगी और जीवन के अस्तित्व के लिए संघर्ष होना प्रारंभ हो जायेगा। नि:संदेह जनसंख्या वृद्धि पर लगाम कसने का सबसे सरल उपाय परिवार नियोजन ही है। जनसंख्या के प्रति जन-जागृति का अभाव होने के कारण अक्सर लोग दस-बारह बच्चों की फौज खड़ी करने में कोई गुरेज नहीं करते। इसलिए सबसे पहले उन्हें जनसंख्या वृद्धि के दुष्परिणामों के प्रति जागरूक करने की महती आवश्यकता है। यह समझने की जरूरत है कि जनसंख्या को बढ़ाकर हम अपने आने वाले कल को ही खतरे में डाल रहे हैं। जनसंख्या संबंधी इन्हीं समस्याओं और चुनौतियों से निपटने के लिए विश्वभर में जनसंख्या संबंधी मुद्दों की गंभीरता और महत्व पर ध्यान दिलाने के लिए प्रतिवर्ष 11 जुलाई को चिंतन-मनन किया जाता हैं। इस प्रकार आज पूरी दुनिया विश्व जनसंख्या दिवस मना रही है। विश्व जनसंख्या दिवस हर वर्ष 11 जुलाई को मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम है। इसका उद्देश्य जनसंख्या सम्बंधित समस्याओं पर वैश्विक चेतना जागृत करना है। यह आयोजन 1989 में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की गवर्निंग काउंसिल द्वारा स्थापित किया गया था। आज से करीब तीन दशक पहले वर्ष 1989 में आज ही के दिन से विश्व की बढ़ती जनसंख्या को लेकर मंथन की शुरुआत हुई और यह 11 जुलाई 1987 को पांच बिलियन दिवस में सार्वजनिक हित से प्रेरित था, जिसकी अनुमानित तारीख जिस पर दुनिया की आबादी पांच अरब लोगों तक पहुंच गई थी, चूंकि वर्ष 1987 में 11 जुलाई को विश्व की जनसंख्या 5 बीलियन यानि 500 करोड़ पहुंच गई थी, इसलिए इस दिन को ‘5 बीलियन डे’ के नाम से भी जाना जाता है। जुलाई 2020 के आंकड़ों के अनुसार विश्व की जनसंख्या लगभग 7.8 बीलियन के करीब तक पहुंच चुकी है। विश्व जनसंख्या दिवस का उद्देश्य विभिन्न जनसंख्या मुद्दों पर लोगों की जागरूकता बढ़ाना है जैसे कि परिवार नियोजन, लिंग समानता, गरीबी, मातृ स्वास्थ्य और मानव अधिकारों का महत्व इत्यादि। इसी के मद्देनजर हर दस साल बाद हमारे मुल्क में जनगणना कार्यकम होती है ताकि यह मालूम हो सके कि मुल्क कि आबादी कितनी हैं। आबादी के आंकड़े ही केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा बनाई जाने वाली योजनाओं का प्रमुख आधार होते हैं। हमारें देश कि गिनती दुनिया के सबसे बड़े देशों में होतीं हैं चाहें वह क्षेत्रफल और आबादी क्यों न हों, हर क्षेत्र में भारत देश का नाम आता हैं। क्षेत्रफल के हिसाब से भारत दुनिया का सातवां सबसे बड़ा देश हैं वहीं जनसंख्या के हिसाब से भारत का नाम चीन के बाद आता हैं। जहाँ पूरे विश्व कि जनसंख्या के 18.47% चीन कि जनसंख्या हैं, वही भारत 17.53% पर हैं। मतलब जनसंख्या आबादी में भारत दूसरे स्थान पर हैं। इस विषय में कुछ विशेषज्ञों और जानकारों का मानना हैं कि हैं कि अगले कुछ अल्प वर्षों में ही आबादी के मामले में हम चीन को भी पछाड़ देंगे। संभवतः अगले 8-10 वर्षों में हमारी आबादी 1.5 अरब के पार हो जाएगी। ऐसा अनुमान है कि विश्व के सबसे जनाकुल राष्ट्र के रूप में भारत चीन को 2030 तक लाँघ लेगा। यह तब है, जबकि 1952 में परिवार नियोजन अभियान अपनाने वाला दुनिया का पहला देश भारत था। मगर आज दुनिया का दूसरा सबसे ज्यादा आबादी वाला मुल्क भारत है। आज हमारे हर सूबे (राज्य) की आबादी दुनिया के किसी न किसी मुल्क के बराबर है। आबादी के लिहाज से उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है, जिसकी आबादी ब्राजील के बराबर है। वैसे, ऐसा नहीं कि बढ़ती आबादी पर नीतियां नहीं बनी या मंथन नहीं हुआ। बदलते वक्त में हालात कुछ सुधरे भी हैं। जागरूकता और बेहतर सुविधाओं के चलते शहरों में गांवों के मुकाबले बेहतर हालात नजर आते हैं। शहरी इलाकों में जन्म दर लगभग 1.8 के करीब है। जबकि ग्रामीण इलाकों में 2.5 के करीब है। इसी तरह कम विकसित राज्यों के मुकाबले विकसित राज्यों में आबादी नियंत्रण के आंकड़े राहत देते हैं। वैसे दिक्कत ज्यादा आबादी की नहीं, बल्कि उसके हिसाब से जरूरी संसाधनों के उपलब्ध न हो पाने की है। दुनिया की 17 फीसदी से ज्यादा आबादी हमारी है, जबकि दुनिया का केवल 4 फीसदी पानी और 2.4 फीसदी जमीन ही हमारे पास है। समझा जा सकता है कि चुनौती कितनी बड़ी है। करोड़ों भारतीय बुनियादी जरूरतों से महरूम हैं।
जिस देश में हर साल 1.2 करोड़ लोग रोजगार के बाजार में आते हों, वहां रोजगार बड़ी चुनौती बन चुका है। जाहिर है हालात बेहद गंभीर हैं, लेकिन आबादी को लेकर सियासत भी जारी है। इस बीच, कुछ राज्यों ने अनोखी पहल भी की। उत्तरप्रदेश में नवविवाहित जोड़ों के लिए शगुन योजना की शुरुआत की। असम में दो से ज्यादा बच्चे वालों को सरकारी नौकरी न मिलने की नीति बनी, तो गुजरात में दो से ज्यादा बच्चों के अभिभावकों के पंचायत चुनाव लड़ने पर रोक लगी। लेकिन बढ़ती आबादी को लेकर ढेरों सवाल अब भी कायम हैं। जैसे, क्या बढ़ती आबादी की बड़ी वजह अशिक्षा और पिछड़ापन रहा है? अगर हां, तो बढ़ती आबादी को धर्म और जाति के चश्मे से क्यों देखा जाता है? राज्यों की नीतिगत विफलताओं का दोष समाज के मत्थे क्यों मढ़ा जाता है? बढती आबादी पर सियासी घमासान क्यों है? क्या आबादी पर काबू के लिए सख्त कानून की दरकार है? बेहतर हो कि नीति-निर्माता और समाज मिलकर महिला साक्षरता, स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रमों पर जोर दें, ताकि लोग परिवार नियोजन से जुड़े सही फैसले ले सकें।
यह सत्य हैं कि सरकारें अपना वोटबैंक सुरक्षित करने के लिए जनसंख्या नियंत्रण अभियान व योजनाओं को हल्के में जाने देती है इसलिए सरकार वोट बैंक कि इस राजनीति छोड़ इस अभियान को धरातल पर उतारने का हर संभव प्रयास करे। जरूरत है कि सरकार इस दिशा में मुहिम को ओर भी तेज करे और एक या दो बच्चा नीति की अनुपालन राष्ट्रीय स्तर पर करने का हरसंभव प्रयास करें।
अन्यथा आने वाले समय और बढ़ती जनसंख्या के कारण भारी मात्रा में खाद्यान्न संकट उत्पन्न हो सकता है। जिसके कारण देश में भुखमरी, पानी व बिजली की समस्या, आवास की समस्या, अशिक्षा का दंश, चिकित्सा की बदइंतजामी व रोजगार के कम होते विकल्प इत्यादि प्रकार की समस्याओं से जूझना पड़ेगा।

(लेखक: शिक्षक, शोधकर्ता, विचारक और विश्लेषक हैं)

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