पुल पर चढ़ते ही ,

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दीघा पुल

@कश्मीरा सिंह

पुल पर चढ़ते ही ,
मन एक अजीब आकर्षण में बँध जाता है ,
नीचे बहती हुई नदी ,
और लहरों को चीरती हुई दो-चार नौकाएँ ,
दूर तक केवल जल ही जल ,
और छोटी-छोटी चमकती हुई लहरें ,
मानों रबड़ को खींचकर छोड़ दिया गया हो ,
मैं दीघा पुल पर हूँ ,
नीचे गंगा नदी बह रही हैं ,
पुल का इतिहास उतना ही पुराना है ,
जितना रावण का नाम ,
सेतु बँध जाने की सूचना पर आवाक ,
रावण दशो आनन से बोल उठा था
“बाँध्यो बननिधि नीरनिधि जलधि सिंधु बारीस।
सत्य तोयनिधि कंपति उदधि पयोधि नदीस॥”
राम की महिमा से ,
उस सेतु ने समुद्र को नहीं मारा ,
किन्तु आज के पुल नदियों को मार रहे हैं ,
मर रहे हैं जीव-जंतु ,
मर रही है सभ्यता। !!

छपरा , सारण ।

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