पर्यावरण दिवस : मानव व प्रकृति का अटूट सम्बन्ध

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@पवन कुमार सैनी

जब से सृष्टि का निर्माण हुआ है। तभी से मानव व प्रकृति का अटूट सम्बन्ध रहा है। मानव प्रकृति का एक अभिन्न अंग है। लेकिन जिस तरह आज मानव भौतिकवाद की तरफ बढ़ रहा है। उसकी भयानक तस्वीर रोज देखने को मिलती है।
आज भारत ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व प्राकृतिक संसाधनों को अंधाधुन्ध दोहन करने में लगा हुआ है।
महात्मा गांधी ने प्राकृतिक संसाधनों के अत्याधिक दोहन को देखते हुए यह बात कही थी कि कि ‘‘ मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए प्रकृति के पास सब कुछ है। लेकिन महत्वाकांक्षा व लालच के आगे कुछ भी नहीं है।’’
वहीं 18वीं सदी के महान अर्थशास्त्री थामस रावर्ट माल्थम ने अपने एक लेख मे चेतावनी दी थी कि ‘‘यदि आत्म नियंत्रण और कृत्रिम साधन से बढती जनसंख्या को समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया तो प्रकृति खुद अपने कूट हाथों से नियंत्रित करने का प्रयास करेगी’’।
पर्यावरण के बिगडते संतुलन को पर्यावरणवादियों ,भूगोलवेत्ताओं एवम शीर्ष संस्थाओं ने पहले से ही गंभीरता से लिया हैं।
पर्यावरण प्रदूषण की समस्या पर सन् 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने स्वीडन में पहला पर्यावरण सम्मेलन जून 5 से जून 16 तक आयोजित किया गया था जिसमे विश्व भर से 119 देशों ने हिस्सा लिया।
और तभी स्वीडन में हुए पहले सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम(UNEP)
का जन्म हुआ। इसी लिए 5 जून को पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। जिसमें पर्यावरण की समस्याओं से अवगत कराया जाता हैं।
ज्ञातव्य है कि पहले सम्मेलन में भारत की तत्कालीन प्राधानमंत्री श्रीमति इंदिरागांधी ने ‘‘पर्यावरण की बिगडती स्थिती एवं उसका भविष्य पर प्रभाव’’ विषय पर व्याख्यान दिया था।
पर्यावरण सुरक्षा कि दिशा में यह भारत का पहला कदम था।
यूॅ तो मानव अपनी आवश्यकताओं के अनुसार प्रकृति का दोहन करता रहा लेकिन धीरे-धीरे मानव भौतिकवादी हो गया। मानव जाति बस्तीयों को छोड जंगल की तरफ बढने लगा। हमने जंगलों को अंधाधुन्ध काटा वहां से लकडी, वन्य सम्पदा वन्य जीव आादि का दोहन अपनी अवश्यकता से ज्यादा किया।
परिणामस्वरूप जंगल खत्म होने लगे। वन्य जीवों की प्रजातियां लुप्त होने लगी। आज मानव के अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया है। वनों की अंधाधुन्ध कटाई से पर्यावरण प्रदूषण फैला है।
वर्षा की स्थिति अनिश्चित हो गई है। जहां वर्षा होती थी वहां बाढ आती है जहां बाढ आती थी वहां आज सूखा है।
हमने जल स्त्रोतों को भी दूषित करने से नहीं छोडा है। अतः हम नदियों, तालाबों व समुद्रों में औद्योगिक कूडा, घरेलू कचरा, शव को बहाना, जहाजों से होने वाला तेल रिसाव ऐसे कई मानव निर्मित कारण हैं । जिनमें जल प्रदूषण अनियंत्रित गति से फैल रहा है। इससे भूजल में भी जहर घुल रहा है।
उत्तरी प्रशान्त महासागर हर साल करीब 1 लाख समुद्री स्तनपाई जीव और
10 लाख पक्षी प्लास्टिक खाने से मारे जाते है।
इन्डोनेशिया का जावा द्वीप दुनिया का सबसे आबादी वाला
द्वीप है यहां लोग कचरा युक्त पानी में तैरने व नहाने को मजबूर हैं।
आश्र्चय की बात तो यह है कि भारत में सबसे पवित्र मानी जाने वाली गंगा नदी जो 2071 किमी. लम्बी है जो करीब 40-50 करोड़ से अधिक लोगों का भरण पोषण करती है को अंतराष्ट्रीय स्तर की एक छळव् वर्ड वाइड फंड ने (WWF) इसे दुनिया की सबसे संकतग्रस्त नदी करार दिया है इसके पीछे संस्था ने तर्क दिया है कि लगभग सभी दुसरी भारतीय नदियों की तरह गंगा में भी लगातार पहले बाढ़ और फिर सुखे की स्थिति पैदा होती है।
विश्व में प्रदुषण की गंभीरता के पीछे कारणों में से एक अहम कारण अनियंत्रित रूप से बढती जनसंख्या है। पिछले 50 वर्षों में वैश्विक जनसंख्या दुगनी हुई है किन्तु प्राकृत संसाधनों की खपत 4 गुनी हो गई है।
वायु प्रदूषण का अहम कारण बढते कल कारखानों से निकला जहरीला धुंआ, परिवहन के साधनों में बेतहासा वृद्वि जंगलों की कटाई शामिल है।
हिसाब लगाया गया है कि कोपेन्हेगन की पिछली बैठक (विगत दिसम्बर) में 40000 से अधिक प्रतिभागियों ने कारण मात्र दो सप्ताह के भीतर उत्सर्जित ‘ग्रीन हाउस गैसें ’ की मात्रा 6 लाख इथोयोपिया बासियों के साल भर के कुल उत्सर्जन से अधिक है।
एक तथ्य के अनुसार दुनिया के 50 करोड़ संपन्न लोगों के द्वारा समस्त कार्बन डाई आक्साॅइड का 50 प्रतिशत फैलाया जाता है जबकि 300 करोड़ सबसे गरीब लोगों के कारण मात्र 6 प्रतिशत प्रदूषण होता है। हमें यह समझना होगा कि मानव की बदली जीवन शैली कितना मानव जाति के लिए कितना संकट पैदा कर रही है। चिन्ताजनक स्थिती सामने आने वाली है हम यही तक नही रूके।
हमने जहां जंगलों को काट कर जीवनदायी गैस आक्सीजन को कम किया वहीं मृदा प्रदूषण को भी बढावा दिया, रासायनिक खाद एवम् कीटाणु नाशकों दवाओं का अत्यधिक प्रयोग, औद्योगिक एव नगरीय कुडा, मृदा की आत्मा की धुवस्त कर रहा है उर्वरक क्षीण हो रहीे है उसी से उपजी जहरीली खाद्यान को हम खाने को मजबूर है।
ये मानने से हमे परहेज नहीं करना चाहिए कि मानव और प्रकृति के लिए खतरा आज मानव ही बन रहा है फिर क्यों ना हमें समय रहते इसे संभालना चाहिये।
मुझे यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि आज सम्पूर्ण विश्व पर्यावरण संरक्षण के लिए वचन वद्व है। आज मानव प्राकृतिक आपदाओं से सबक लेकर प्रकृति को संवारने में रूचि ले रहा है।
अन्तराष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन द्वारा हर पाचं वर्ष में एक वार रिपोर्ट प्रकाशित की जाती है 2015 की रिपोर्ट के अनुसार भारत को दुनिया के उन 10 देशों में 8 वां स्थान दिया गया है। जहां वार्षिक स्तर पर सबसे अधिक वृद्वि दर्ज की गई।
वनों की महत्ता को हम समझ रहे है। भारत वन स्थिति रिपोर्ट के अनुसार 2017 में वनों एवं वृक्षों से आच्छादित कुल क्षेत्रफल 8,02,088 वर्ग किमी था जो 2019 में बढकर 8,07,276 वर्ग किमी हो गया यहां 0.17 प्रतिशत की वृद्वि हुई। एवं वृक्षों से आच्क्षादित क्षेत्रफल में 2.89 प्रतिशत वृद्वि दर्ज की गई।
ये संकेत साफ साफ जाहिर करते हैं कि आज हम भौतिकवाद से प्रकृतिवाद की तरफ मुड़ रहे हैं जो बेहद जरूरी भी है ।
भारत में पर्यावरण संरक्षण का इतिहास सदियों पुराना है। हडप्पा संस्कृति पर्यावरण से ओत-प्रोत थी, तो वैदिक संस्कृति पर्यावरण-संरक्षण हेतु पर्याय बनी रही। भारतीय जनमानस ने समूची प्रकृति ही क्या, सभी प्राकृतिक शक्तियों को देवता स्वरूप माना। ऊर्जा के श्रोत सुर्य को देवता माना तथा उसको ‘सूर्य देवो भव’ कहकर पुकारा। भारतीय संस्कृति में जल को भी देवता माना गया है। नदियों को जीवन दायिनी कहा गया है, इसीलिए प्राचीन संस्कृतियां नदियों के किनारे उपजीं और पनपी। भारतीय संस्कृति में केला, पीपल, तुलसी, बरगद, आम आदि पेड पौधों की पूजा की जाती रही है। ईशोपनिषद से अशोक महान तक पर्यावरण प्रेम सभी जगह देखा गया। स्वतंत्र भारतीय संविधान सीधे तौर पर पर्यावरण संरक्षण के प्रावधानों से नहीं जुडा था।सरकार ने 1976 में संविधान में संशोधन कर दो महत्त्वपूर्ण अनुक्वछेद 48 ए तथा 51 ए (जी) जोडे। अनुक्वछेद 48 ए राज्य सरकार को निर्देश देता है कि वह ‘पर्यावरण की सुरक्षा और उसमें सुधार सुनिश्चित करे, तथा देश के वनों तथा वन्य जीवन की रक्षा करे’। अनुक्वछेद 51 ए (जी) नागरिकों को कर्तव्य प्रदान करता है कि वे ‘प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करे तथा उसका संवर्धन करे और सभी जीवधारियों के प्रति दयालु रहे’। स्वतंत्रता के बाद बढते औद्योगिकरण, शहरीकरण तथा जनसंख्या वृद्धि से पर्यावरण की गुणवत्ता में निरंतर कमी आती गई। पर्यावरण की गुणवत्ता को बनाए रखने व प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने समय-समय पर अनेक कानून व नियम बनायें।
जून 2014 फ्लैगशिप कार्यक्रम के रूप में भारत की अभूतपूर्व नदी स्वच्छता मिशन “नमामि गंगे परियोजना” को अनुमोदित किया । जिसमे पूर्ण रूपेण गंगा नदी जो हमारी सांस्कृतिक एवम आध्यात्मिकता का प्रतीक है के लिये 20,000 करोड़ खर्च करने का प्रावधान है । इस मिशन के तहत करीब 30,000 हेक्टेयर भूमि पर वृक्ष लागये जाना, कचरे का निस्तारण, औधोगिक वेस्ट को नदी में मिलने से रोकना आदि शामिल हैं।
भारत वैश्विक स्तर पर स्वच्छता का आइकॉन बनता जा रहा है ।भारत के मा.प्रधानमंत्री जी ने 2 अक्टूबर ,2014 को “स्वच्छ भारत मिशन” अभियान शुरू कर सम्पूर्ण विश्व को यह संदेश दे दिया कि भारत आज पर्यवारण संरक्षण एवम स्वच्छता जैसे वैश्विक मुद्दों पर गंभीर है ।

पर्यवारण संरक्षण के लिये जितनी गंभीर सरकार है उतना ही गंभीरता से जनता को भी इसका अनुसरणं कर सहभागिता दिखानी होगी।
हमें पर्यवारण संरक्षण को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना होगा।
आज बदलाव को स्वीकारने की जरूरत है ।
हम ई फाइलिंग का उपयोग कर बिना पेपर काम करके प्रतिवर्ष 104 मिलियन पाउंड पेपर एवम 72800 पेड़ो को कटने से बचा सकते हैं ,साथ साथ सभी को वृक्षारोपण का महत्व समझना होगा,
ज्यादा से ज्यादा काम पेपरलैस हो ,फ़ाइल इलेक्ट्रिक रूप संचित की जानी चाइये,,
आज जरूरत है संसाधनों का सदुपयोग की चाहे पानी हो या बिजली , सभी को रेन वाटर हार्वेस्टिंग एवम सोलर सिस्टम को अपने घरो की छतों पर स्थापित करने की पहल करनी चाहिए।
रीसाइक्लिंग की आज महती आवश्यकता है । पॉलीथिन, पानी, इलेक्ट्रिक सामान, जो भी सम्भव हो रीसायकल किया जाना चाहिए ,ताकि काफी हद तक प्रदूषण पर नियंत्रण लग सके।
अनावश्यक वाहनों का प्रयोग रोकना होगा जिससे प्रदूषण के स्तर में गिरावट आये।

आज प्रिंट मीडिया ,सोशल मीडिया एवं अन्य माध्यमों से पर्यवारण संरक्षण के प्रति अभियान को जोर देने की जरूरत है। ताकि हर नागरिक पर्यवारण संरक्षण के अभियानों जे जुड़ सके और अपना पूर्ण सहयोग इस दिशा में दे। फिर वह दिन दूर नहीं जब वातावरण स्वच्छ होगा, स्वास्थ्यप्रद होगा।
ताकि मानव जाति सुरक्षित , एवम फलती फूलती रहे।

लेखक
पवन कुमार सैनी
शिक्षक एवं साहित्य प्रेमी
भरतपुर राजस्थान

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