लालूवाद क्या है?

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संपादकीय: जोकीहाट विधानसभा उपचुनाव के नतीजे के बाद बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और सम्प्रति विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने अपनी पार्टी की जीत पर सहज प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि यह लालूवाद कि जीत है यानी यह लालू जी के विचारों की जीत है तेजस्वी के इन बातों को सुन कर भाजपा जदयू और लोजपा के कुछ नेताओं ने तेजस्वी के लालूवाद से संबंधित विचारो पर वितंडा खड़ा करते हुए इसे व्याख्यायित करने की चुनौती तक दे डाली है पिछले 40 वर्षों से विश्विद्यालय में राजनीति का दर्शन पढ़ाते हुए तथा समसामयिक विषयों पर टिप्पणी करते हुए मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि लालूवाद समाज के उन दबे पिछड़े गरीब दलित शोषित एवं अल्पसंख्यक वर्गो की वह आवाज है जिसकी क्रियात्मक शुरुआत नब्बे के दशक से प्रारंभ हुई थी और किसी न किसी रूप में विकसित एवं परिस्कृत होकर आज भी अनवरत रूप से चल रही है इसकी पूर्व पीठिका में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का ‘समाज के अंतिम व्यक्ति’… का दर्शन, डॉ राम मनोहर लोहिया का पिछड़े पावें 100 में 60 कर्पूरी ठाकुर का राजनीति के मुख्यधारा से बहिष्कृत कर दिए गए व्यक्तियों की आवाज चौधरी चरण सिंह का किसान प्रेम पूर्व प्रधानमंत्री बीपी सिंह का मंडल आरक्षण क्रियान्वयन, मौलाना अबुल कलाम आजाद एवं मौलाना मजहरुल हक़ का राष्ट्रीय एकता एवं संप्रदायिक सदभावना यानी गंगा-जमुनी तहजीब वाले हिंदुस्तान की परिकल्पना है। लालू जी ने अपने पंद्रह वर्ष के शासन काल में इसी विचार एवं इसी विचार को व्यवहार में लाने का कार्य किया था और इसी के वजह से तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद लगभग डेढ़ दशक तक बिहारी आवाम नें लालू को अपने सर माथे पर बिठाए रखा यही नहीं बिहार से चल कर जब लालू राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली पहुचते है तो वहाँ भी अपनी काबिलियत का लोहा देश दुनिया में बनाये रखने में कामयाब हो जाते हैं इस बीच उन्हें अनेक दुष्वारियों का भी सामना करना पड़ता है।
इस दरम्यान राष्ट्रीय मीडिया का एक बड़ा वर्ग उन्हें लगातार नीचा दिखाने की कोशिश करने के बावजूद अपने टीआरपी को बढ़ाने के लिए लालू जी के आस पास मंडराता हुआ भी दिखलाई पड़ता है उस समय संकर्षण ठाकुर की अंग्रेजी पुस्तक Making Of Lalu Prasad and unmaking of Bihar भी हमे देखने को मिलता है परंतु 21वी सदी के प्रथम दशक में हिंदी पत्रकारिता के शलाका पुरूष तथा जनसत्ता के तत्कालीन संपादक स्वर्गीय प्रभास जोशी की यह टिप्पणी भी हमें देखने को मिलती है कि लालू न सिर्फ देश बल्कि दुनिया के सबसे बड़े कॉम्युनिकेटरों में से एक है परंतु इन उपलब्धियों का खामियाजा भी लालू जी को भुगतना पड़ता है।
सीबीआई सहित विभिन्न जांच एजेंसियों उनके पीछे पड़ जाती है कोर्ट कचहरी सजा जेल और अन्य तनाव के चलतें वे अपने स्वास्थ्य समस्याओं से भी प्रभावित होते है
आज हालात यह है कि वे बम्बई या दिल्ली में अस्वस्थता कारण इलाज कराते रहनें के बावजूद आज देश में भाजपा एवं मोदी विरोध के सबसे बड़े चेहरे के रूप में उभर कर सामने आये हैं जो 2019 के राष्ट्रीय राजनीति में खड़ा होने वाला है।
उपरुक्त प्रस्थापनाओं के आधार पर हम लालूवाद को इस तरह परिभाषित कर सकते है कि ” लालूवाद गरीबों का गरीबों के लिए गरीबों के द्वारा चलाया जाने वाला एक ऐसी सामाजिक राजनैतिक विचारधारा है जिसमे इस देश की आबादी के 85% लोग विश्वाश करते है।

डॉ लाल बाबू यादव
विभागाध्यक्ष स्नातकोत्तर राजनीति विज्ञान विभाग
जय प्रकाश विश्वविधालय,छपरा ।

नोट: यह लेखक के निजी विचार है। यह लेख उनके फेसबुक से साभार लिया गया है।

Ganpat Aryan

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Multimedia Journalist

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