बेहतर शिक्षा के नाम पर चलती है जेब पर कैंची, किताबों के नाम पर करोड़ों का खेल

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गणपत आर्यन की रिपोर्ट
छपरा । निजी स्कूलों में बेहतर शिक्षा के नाम पर पूरे साल अभिभावकों की जेब पर कैंची चलती हैं. स्कूल के अंदर ड्रेस,किताब स्टेशनरी के नाम पर अभिभावकों से मनमाने ढंग से पैसे वसूले जा रहे हैं. नये सत्र के लिए बच्चों को मजबूरन स्कूल से ही सामान खरीदना पड़ रहा है.प्रशासन भी ऐसे स्कूलों पर कोई करवाई नहीं करता.निजी स्कूल शिक्षा विभाग के नियमों को ताक  पर रखकर एंसीआईआर्टी के अधिकृत किताबों का सिलेबस रखकर प्रशासन के नियमों  को धता बताकर करोडों का खेल कर रहे है.अभिभावकों के मुताबिक निजी स्कूलों की किताबें भी सिर्फ स्कूलों की दुकानों पर मिलती है.इस बार किताबे 25 परसेंट तक महंगी हो चुकी हैं. स्कूल इन किताबों के मूल्य भी स्वयं निर्धारित करते है.जिन्हें अभिभावकों चाहते हुए भी खरीदना पड़ता है.अभिभावक निजी स्कूलों की मनमानी से परेशान हैं. कुछ अभिभावकों का कहना है कि इसमें 40 से 50 प्रतिशत तक कमीशन स्कूलों की बनती हैं. हर बार री-एडमिशन के साथ ही निजी प्रकाशनों की किताबें खरीदनी पड़ रही हैं.
 
टैक्स से बचने का भी खोजा जुगाड़
निजी स्कूल ड्रेस स्टेशनरी को अभिभावकों से बेचते है और इसका प्रिंटेड बिल भी नहीं देते.सिर्फ कम्प्यूटर या हाथ से बने बिल अभिभावकों को देते हैं. अभिभावकों को दिये बिल पर ऐसे दुकानदार सरकार को सेल टैक्स नहीं देते हैं. ऐसे में सरकार को मिलने वाले लाखों के टैक्स को हजम कर जाते हैं. जिले में लगभग हर साल 40 से 50 हजार बच्चे नए एडमिशन करवाते हैं. जिन्हें स्कूल द्वारा ड्रेस और स्टेशनरी के सामान बेचे जाते है.
 
हर साल बदल जाती हैं किताबे
ज्यादातर स्कूल हर साल किताबें बदल देते हैं. पूरी कुटाबे नहीं भी बदलती तो कुछ चैप्टर ही बदल देते हैं, तस्कि बच्चे पुरानी किताबों का उपयोग नहीं कर सके.ऐसे में अभिभावकों को मजबूरी में नई किताबे खरीदनी पड़ रही हैं. कुछ वर्ष पहले तक सीघे  प्रकाशक से पैसा लिया जाता था,चाहे किताबें कही बिके, लेकिन अब सिस्टम बदल गया है.अब प्रकाशक और बुक डिपो दोनों से स्कूल संचालक  मोटी रकम ले रहे है,जिसका सीधा असर  अभिभावकों की जेबों पर पड़ रहा हैं.
स्कूलों में स्टाइल की कापियां
नये सत्र से कुछ स्कूलों ने अंग्रेजी लिखने के लिए स्पेशल स्टाइल की कापियां प्रयोग की है.जिनमें शहर का नामी स्कूल भी शामिल है.स्कूल में अंग्रेजी के लिए अलग कॉपी प्रयोग होती हैं. यह कॉपी सिर्फ उसी बुक डिपो पर उपलब्ध होगी,जो कि महंगी मिलती है.जबकि कॉपियों तक पर कोई भी रियायत नहीं दी जाती है.
प्रशासन को उठाना होगा ठोस कदम
कुछ निजी स्कूल बाहर के दुकानदारों को ड्रेस व स्टेशनरी बेचेने की अनुमति दे रखी हैं. नतीजा स्कूल अभिभावकों से मनमाने रेट पर ड्रेस व स्टेशनरी खरीदवा लेते हैं. यदि प्रशासन अभिभावक और सरकार के बीच में अपना विश्वास बनाये रखना चाहती है तो ऐसे स्कूलों के खिलाफ कदम उठाना होगा,नहीं तो अभिभावकों का प्रशासन के ऊपर से विश्वास खत्म हो जायेगा.
बोर्ड से अभिभावक कर सकते है शिकायत
स्कूल द्वारा कमीशन के नाम पर बाहरी  किताबें थमाने के खेल से सीबीएससी बोर्ड ने सख्ती से निबटने का फैसला किया है.बोर्ड की ओर जारी सर्कुलर के मुताबिक,निजी स्कूलों को अब एनसीआरटी की ही किताबो से पढ़ाना होगा.बोर्ड ने इसके लिए स्कूलों को निर्देश जारी किया है.कोई स्कूल ऐसा नहीं करता है तो अभिभावक इसकी शिकायत बोर्ड से कर सकते है.
ऐसे करते हैं मनमानी
  • स्कूल अपने मन मुताबिक सिलेबस में लगाते है मंहगे प्रकाशकों की किताबें
  • एनसीआरटी की तुलना में दस गुनी तक महंगी है निजी पब्लिकेशन की किताबें
  • कमीशन के चलते खास दुकानों पर उपलब्ध रहती है निजी स्कूलों की किताबें
  •  जिले भर के सीबीएसई बोर्ड के स्कूल में भी होता है लाखों रुपये का कारोबार
  • 40 से 50 प्रतिशत  के कमीशन पर चलता है यह निजी प्रकाशकों की बुक का खेल

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