पुरुषों के फील्ड में कदमताल मिला कर 3 पहियों के सहारे ये महिलाएं चला रहीं है ‘घर की गाड़ी’

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पटना : हम बचपन से सुनते आये हैं, मेहनत करने वालों की कभी हार नहीं होती. इसका उदाहरण भी हमें समय-समय पर देखने को मिलता है. अपने शहर में भी कई ऐसे शख्स हैं, जिन्होंने अपने बलबूते पर अपनी पहचान बनायी है. पटना एयरपोर्ट से ऑटो चलाने वाली महिलाओं ने भी एक मिसाल कायम की है.पुरुषों के वर्चस्व वाले फील्ड में इन महिलाओं ने एक मिसाल कायम किया है. कई बार हम आर्थिक विषमताओं के कारण कुछ ऐसा पेशा अपना लेते हैं, जो चैलेंजिंग हो जाता है. ऐसे भी ऑटो चलाने का पेशा पुरुषों का ही माना जाता है, ऐसे में महिलाएं इस फील्ड में कड़ी मशक्कत के बल पर अपनी अलग पहचान बना रही हैं. कुछ महिला ऑटो ड्राइवर  एयरपोर्ट से पैसेंजर लेती हैं, तो कुछ रेलवे स्टेशन से उठाती हैं. हालांकि इनको ताने सुनने ही पड़ते हैं. पर, इन सबको दरकिनार करते हुए वे अपना काम कर रही हैं
 
पिछले पांच साल से ऑटो चला रही हूं. पहले रेलवे स्टेशन से पैसेंजर लेती थी, पर वहां के ड्राइवरों ने हमें वहां रहने नहीं दिया. इस बीच, एयरपोर्ट पर महिला ऑटो चालक पैसेंजर लेकर जाती थी, तो मैं भी यहीं आ गयी. मेरी ड्राइविंग करने का मकसद अपने तीन बच्चों का भरन-पोषण करना है. पति काम नहीं करना चाहते थे, जिसकी वजह से हमें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा. खुद के लिए और बच्चों के लिए इस फील्ड में आयी और पिछले एक साल से अपने पति से अलग रह रही हूं. पहले एयरपोर्ट और रास्ते में ऑटो ड्राइवर पास नहीं देते हैं और ओवर टेक करने पर   पीछे से आकर कुछ भी बोल जाते थे.
पिछले एक साल में हमें इस फील्ड में सब जानने लगे और कुछ लोगों को छोड़कर हमें सपोर्ट भी करते हैं. कई बार गाड़ी रास्ते में खराब हो जाती है, तो दूसरे ड्राइवर हमारी मदद भी करते हैं, लेकिन इस महीने प्रीपेड बंद हो जाने से फिर से परेशानी शुरू हो गयी है. पैसेंजर लेने में परेशानी होती है. मैं सुबह 10 से शाम 6 बजे तक ही लोकल जगहों के पैसेंजर ले जाती हूं. .
 
अनिता देवी, मीठापुर  
 
दूसरों को देख हिम्मत आयी और मैं भी चलाने लगी ऑटो
 
मैं अपनी मां और पति के साथ रहती हूं. मां फल की दुकान चलाती है और मेरे पति कुछ नहीं करते हैं. ऐसे में घर चलाने में दिक्कत होने लगी. इससे पहले मैंने एक दो महिलाओं को ऑटो चलाते देखा था, तो एहसास हुआ कि मुझे भी अगर मौका मिले, तो मैं भी ऑटो ड्राइवर बनना चाहूंगी. इसी बीच मेरी मुलाकात अनिता दी से हुई, उनसे मुझे प्रेरणा मिली और मैंने ड्राइविंग की ट्रेनिंग ले लोन पर ऑटो ले लिया. एक साल से गाड़ी चला रही हूं. यहां एयरपोर्ट में प्रीपेड बंद कर दिया गया, तो ऐसे में पैसेंजर मिलने में परेशानी होती है. टैक्सी ड्राइवर सपोर्ट नहीं करते है. साथ ही ऑटो ड्राइवर कुछ ही है, जो हमारा सपोर्ट करते हैं. पहले रोड पर ऑटो चलाते वक्त काफी सावधानी बरतती थी, लेकिन अब आराम से ड्राइविंग कर लेती हूं. कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता है, बस आपका हौसला बुलंद होना चाहिए. कई बार मैंने भी हिम्मत हारी, लेकिन अपने परिवार के लिए फिर से खुद को संभाला और अपना काम कर रही हूं. 
 
सुलेखा देवी, शिवपुरी
 
सिर्फ पति के पैसे से घर चलाना हो रहा था मुश्किल
 
मैं पिछले एक साल से ऑटो चला रही हूं. पति पहले प्राइवेट जॉब में थे, पर अब मेरे साथ ही वो भी गाड़ी चलाते हैं. इस महंगाई में एक का कमाना काफी नहीं था. अब तो दो साल का मेरा बेटा भी है. सही ढंग से जीने के लिए मैंने उन्हीं के कहने पर नवीन मिश्रा द्वारा वैटनरी कॉलेज में महिला ड्राइवर की ट्रेनिंग ली, जिसके बाद ही ऑटो चलाना शुरू किया. 
 
शुरुआत में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता था. एयरपोर्ट में पैसेंजर जब आते थे, तो टैक्सी ड्राइवर अपनी मनमानी करते थे. अगर हम किसी पैसेंजर को अपने ऑटो में ले जाने की बात करते थे, वे तो गंदी-गंदी बातें करते ही थे, बुरा बर्ताव भी करते थे. हमारे सपोर्ट में कोई कुछ नहीं कहता था.
 
एक दिन मेरी बहस एक टैक्सी ड्राइवर से हो गयी थी, उस वक्त मेरे साथ कोई नहीं था और सभी टैक्सी ड्राइवर ने मेरे साथ बदसलूकी की थी. उस वक्त मैंने खुद को बचाने के लिए काफी आवाज लगायी थी, किस्मत से एक सिपाही ने आकर मेरी मदद की थी. पहले सुबह 8 से शाम 6 बजे तक रहती थी, अब बच्चे की वजह से बीच में ब्रेक लेना पड़ता है.
संगीता, गर्दनीबाग 
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