जाने वो कौन-सा देश जहां तुम चली गई, मालिनी बोलीं-तीस्ता की आंखों में तैरते थे सपने

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वहीं, तीस्ता की गायिकी के दीवाने सोशल मीडिया पर उसके स्वस्थ होने की कामना कर रहे थे. भोजपुरी फिल्म जगत से लेकर आम आदमी भी उसकी मदद के लिए आगे आए. मशहूर लोक गायिका शारदा सिन्हा ने भी तीस्ता के स्वस्थ होने की कामना की थी.  डॉक्टरों ने कहा कि उसे एक्यूट सेप्टेसेमिया हो गया था. इसमें पूरे शरीर में खून संक्रमित हो गया. तीस्ता गले से कुछ भी निगल नहीं पा रही थी. स्थिति में सुधार नहीं होने पर डॉक्टरों ने उसे वेंटिलेटर पर रखा. लेकिन, नियती से मंगलवार रात तीस्ता जिंदगी की जंग हार गई. तीस्ता के असमय जाने से भोजपुरी भाषी समेत पूरे बिहार में शोक की लहर में डूब गया.

तीस्ता मुझे मंच पर निहारा करती
लोकगायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी अपने फेसबुक पेज पर लिखती हैं, सारण हो या पटना, सोनपुर हो या राजगीर. अपने पिता का हाथ थामे एक दुबली पतली किशोरी सदा मुझसे मिलने आती. कभी साथ तस्वीर खिंचाने का आग्रह, तो कभी मेरा हाथ पकड़ साथ चलने की ललक आंखों में समेटे वह कन्या बड़ी तल्लीनता से मुझे मंच पर निहारा करती. कार्यक्रम के बाद पिता के साथ पुनः मिलने आती.

जब उसे देख बेहद लाड़ और गर्व हो आया
बेहद सुलझे हुए पिता उसे मंच की, कला की बारीकियां बताते, मुझसे सीखने को कहते, आशीर्वाद देने को कहते. वह बिटिया बड़ी शिष्टता, लेकिन संकोच के साथ मुझसे सवाल पूछती, प्रशंसा करती उसकी आंखों में तैरते सपने मेरी आंखों ने पहचान लिए थे. जल्दी ही एक मंच पर उससे बतौर कलाकार भेंट हुई. गाथा गायन करती उस प्यारी तरुणी को देख बेहद लाड़ और गर्व हो आया. वह तीस्ता नदी की तरह निर्मल चंचल पवित्र तरुणी तीस्ता थी.

फिर अचानक एक दिन फेसबुक में कुछ पढ़ा
भोजपुरी ने अपना निसृत स्रोत उसमें ढूंढ लिया था. वह आने वाले समय में भोजपुरी को सहेजने संवारने जा रही थी. दायित्व बोध के साथ पिता उदय सिंह के मार्गदर्शन में ओजस्वी गाथा गायन की प्रशस्ति चहुं ओर प्रसरित होने लगी और फिर अचानक एक दिन फेसबुक में कुछ पढ़ा.

दीदी तीस्ता हमारे हांथों से जा रही है 

पांच दिन पूर्व पढ़ी तीस्ता की बीमारी की खबर उसे हम सबसे इतना दूर ले जाएगी. यह अकल्पनीय था. मन न माना, उदय जी से हाल लेती रही, लेकिन परसों जब भरे कंठ से वे मुझसे फोन पर बोले,”दीदी तीस्ता हमारे हांथों से जा रही है और हम कुछ नहीं कर पा रहे, अब दिल्ली ले जाने वाली स्थिति भी नहीं रही” मैं सुनकर सन्न रह गई. ऐसा अनर्थ, ईश्वर है भी या नहीं. ये उसका कैसा अन्याय है?

यह असहनीय वेदना का समय है
मालिनी आगे लिखती हैं कि फिर भी चमत्कार की आशा में बैठी थी कि शायद वह फिर उठ बैठे, वीर कुंवर सिंह गाथा सुनाने को. लेकिन नियति ने ऐसा न होने दिया. तीस्ता सत्रह वर्ष की अल्पायु में बह्मलीन हो गई. एक प्रदीप्त आशा का दिया बुझ गया. उदय जी को किन शब्दों में ढांढस बंधाऊ, यह असहनीय वेदना का समय है. उन पर, परिवार पर, और समस्त भोजपुरी समाज पर. बेटा, इतनी अल्प आयु में तुमने जो अर्जित किया वह बिरले कलाकारों को नसीब होता है. तीस्ता, तुम्हारी मेधा को नमन.

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