एक सफल रणनीतिकार का समापन….

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एक सफल चुनावी रणनीतिकार से नेता तक का सफर आज पूरा हुआ।अमेरिका में चुनावी रणनीति का सबक लेकर भारत में अपना लोहा मनवा लेने वाले प्रशांत किशोर ने आज जदयू की सदस्यता ग्रहण कर ली।प्रशांत भारत में अपने कैरियर की शुरुआती दिनों से ही बड़े नतीजे देते रहे है।सबसे पहले नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के संग्राम में बड़ी सफलता मिली।पीएम मोदी की सफलता में इनकी बड़ी भूमिका मानी गई।नितीश कुमार से जुड़ने के बाद सबसे बड़ा चैलेन्ज मिला जब परचम लहरा रहे मोदी के खिलाफ नितीश कुमार खुद खड़े हुए।पीएम के लगातार हमले और बड़े घोषणाओं के बाद भी बिहार में बीजेपी की हार ने प्रशांत किशोर को सफलता की गारंटी वाला शख्स बना दिया।वो चाहे DNA की बात पर लाखो कार्यकर्ताओ का नाख़ून, बाल भेजना हो या फिर अबकी बार नीतीशे कुमार का स्लोगन हो ….ये सारे रणनीति प्रशांत की ही देन थी।2015 में दरवाजे दरवाजे नेताओ को जाकर दरवाजा खटखटाना,लोगो के बीच जाकर जरूरतमंदों का सर्वे करना,सर्वे के बाद सात निश्चय का दस्तावेज, बिहार में पहली बार देखा गया जो प्रशांत की ही रणनीति थी।अपन सैकड़ो प्रोफेशनल के साथ दिन रात मेहनत करना और अपने कस्टमर को बखूबी नतीजा देना ही इनकी पहचान रही है।हालाँकि ये भी उतना ही सच है कि कोई भी रणनीतिकार सिर्फ अपने रणनीति से किसी नेता या पार्टी को सत्ता में कभी नहीं ला सकता।अगर आपके मुखिया की स्वीकारिता लोगो के बीच नहीं तो फिर लाख रणनीति बना ले कोई फायदा नहीं।पर ये भी उतना ही सच है कि आज की राजनीति और राजनितिक चुनाव जिस तरीके से लडे जा रहे है उसमें अच्छे रणनीतिकार के होने से लड़ाई थोड़ी आसान हो जाती है।क्योंकि अब जनता भी रणनीतियों से प्रभावित होती है।मगर प्रशांत किशोर के इस फैसले ने उनकी रणनीतिक सोच पर सोचने पर जरूर मजबूर कर दिया है।जदयू में वो किस सोच और रणनीति के तहत शामिल हुए ये वो ही जाने पर इतना तोतय है कि अब रणनीतिकार प्रशांत कुमार की पहचान जदयू के नेता की हो गई है।पहले दुसरे को अपनी रणनीति के बदौलत चुनावी सफर पार कराने का बेडा उठाते थे, अब इनके कंधे पर खुद की पार्टी की नैया पार लगाना बड़ा चैलेन्ज होगा।पार्टी का हर परफॉर्मेंस अब इनके ब्यक्तिगत सफलता और असफलता से जोड़ा जाएगा।

अपनी अलग पहचान पर पूर्णविराम लगाकर इस जमात में खड़े होने का निर्णय किन परिस्थितियों में लिया ये वो ही जाने पर सवाल कई है -।क्या अब प्रशांत किशोर सिर्फ अपनी पार्टी का दिनभर बैठकर रणनीति बनाएंगे या इन्हें दूसरे से डील की सुविधा मिलती रहेगी।क्या सुबह सुबह उठकर विरोधियो को गलियाने से शुरू करने वाले बयान बंद हो जायेंगे या फिर इसे और बढ़ाने की रणनीति बनाएंगे।क्या चाटुकारिता के जरिये पार्टी में बने रहने वाले नेताओं का नया ठिकाना प्रशांत बनेंगे।क्या अब प्रशांत किशोर मिडिया में आकर खुद पार्टी का स्टेंड संभालेंगे।प्रशांत किशोर ने अबतक मिडिया से दूरी बनाए रखा है जिसके कारण भी वो पहेली बने रहे अब मिडिया के सवालों के सामने आने के बाद ये पहेली भी ख़त्म होगी।आशा है मिडिया भी तनिक बख्शने के मूड में नहीं होगी।कहते है सफर पूरा हो जाये,चरम बिंदु प्राप्त हो जाये तो फिर मान लेना चाहिए फिर नीचे उतरना ही एक मात्र रास्ता बचता है।शायद प्रशांत किशोर को भी लगने लगा था कि अब ढलान आना शुरू हो गया है।प्रशांत किशोर को अपने पार्टी में शामिल कर नितीश कुमार अपनी रणनीति में जरूर सफल रहे है पर एक सफल रणनीतिकार का किसी पार्टी में शामिल हो जाना मेरे ख्याल से अपनी रचनाशीलता के साथ किया गया आत्महत्या है।

 Ravi S Narayan

सीनियर जर्नालिस्ट NEWS18 BIHAR

नोट:यह लेख न्यूज18 के सीनियर जर्नालिस्ट रवि एस नारायण के फेसबुक वाल से सभार लिया गया। यह लेखक निजी विचार है। 

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