गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए नियोजित शिक्षकों को समान काम समान वेतन दे सरकार: डॉ. रणजीत

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छपरा । डॉक्टर प्रो. रणजीत कुमार ने शिक्षकों को समान काम के लिए समान वेतन देने की मांग की है और इसको लेकर सरकार को खुला पत्र लिखा है । उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने जो न्याय-निर्णय दिया है, वह अपेक्षा के उलट निर्णय कम, सरकार को सलाह ज्यादा है। न्यायालय ने इसे नीतिगत मसला कहकर गेंद सरकार के पाले में डाल दिया है।उन्होंने कहा कि यहां प्रश्न शिक्षकों के हार जीत का नहीं है। सवाल राज्य की गरीब जमात के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने का है, ताकि सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चे पब्लिक स्कूलों में पढ़ने वाले साधन संपन्न बच्चों के साथ प्रतिस्पर्धा कर सके। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद से राज्य के लगभग 4 लाख नियोजित शिक्षक हताश, निराश एवं व्यथित है। क्या टूटे हुए और मानसिक पीड़ा से गुजर रहे शिक्षकों से अपने छात्रों को सर्वोत्तम देने की अपेक्षा की जा सकती है। शिक्षा लंबे समय का निवेश है, जिसके माध्यम से समाज और राज्य के भविष्य का निर्माण होता है। उन्होंने कहा कि क्या शिक्षा व्यवस्था को नियोजनवाद एवं तदर्थवाद के आधार पर संचालित करना राज्य एवं समाज हित में है। डॉकुमार ने कहा कि बिहार में नियोजित शिक्षकों के लिए जो नियमावली बनाई गई है। वह पूरी तरह से एक पक्षीय एवं शिक्षक विरोधी है।इन नियोजित शिक्षकों के वेतन से न तो भविष्यनिधि कटौती (P. F) हो रही है। न तो, सेवांत लाभ मिलने का प्रावधान है। न ही पेंशन मिलना है। एकेडमिक कैरियर को आगे बढ़ाने के लिए यदि कोई शिक्षक पी- एचडी करना चाहते हैं तो, उसे अवैतनिक अवकाश लेना पड़ता है। सेवा काल में प्रोन्नति की कोई गुंजाइश नहीं है। अल्प वेतन में अपने गृह जिला से 300-400 किलोमीटर दूर नौकरी कर रहे शिक्षकों के लिए अंतर जिला स्थानांतरण का भी कोई प्रावधान नहीं है। उन्होंने कहा कि नियोजित शिक्षक अध्यापन के अलावा सरकार द्वारा निर्देशित- निर्धारित तमाम सरकारी कार्य करते हैं, लेकिन सरकारी कर्मी वाली सुविधा से पूरी महरूम है। कुल मिलाकर नियोजित शिक्षकों की स्थिति बंधुआ मजदूर जैसी है। 60 साल की उम्र तक सेवा देने के बाद खाली हाथ घर लौटना उनकी नियति बन गई है। क्या इस तरह की सेवा शर्तों के साथ कोई मेधावी छात्र-छात्रा शिक्षक बनाना चाहेंगे और जब मेधावी छात्र इस दिशा में नहीं आएंगे तो, फिर सरकारी विद्यालयों में छात्रों के गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के सरकारी दावे का क्या होगा। उन्होंने कहा कि सबका साथ, सबका विकास तथा न्याय के साथ विकास की यात्रा में शिक्षक बहुत पीछे छूट गए हैं। इनकी वाजिब मांगों को पूरा कर ही शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाया जा सकता है। इसलिए नियोजित शिक्षकों की वाजिब समस्याओ एवं मांगों पर सहानुभूति पूर्वक विचार कर निदान तलाशना वक्त का तकाजा है। बिहार में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं शिक्षक सरकार को तत्काल निम्नलिखित कदम उठाकर शिक्षकों के मन में पनप रहे आक्रोश एवं कुंठा को दूर करना चाहिए। उन्होंने कहा कि नियोजित शिक्षकों को तत्काल राज्य कर्मी घोषित किया जाए। सरकार उदारता दिखाते हुए शिक्षकों के लिए समान काम समान वेतन देने का साहसिक निर्णय ले। उन्होंने कहा कि शिक्षकों के वेतन से भविष्य निधि कटौती सुनिश्चित किया जाए। शिक्षकों को परमानेंट रिटायरमेंट अकाउंट नंबर आवंटित कर उसे नेशनल पेंशन स्कीम से जोङा जाए ताकि अवकाश ग्रहण करने के उपरांत उनकी सामाजिक, आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। राज्य में शिक्षकों के 60 पदों को समाप्त करने (डाइंग कैडर) संबधी निर्णय को अविलंब वापस लिया जाए क्योंकि, जब अस्थाई पद नहीं रहेगा तो, अस्थाई नियुक्ति कैसे होगी। अपने विषय में विशेषज्ञता हासिल करने तथा एकेडमिक बेहतरी के लिए जो शिक्षक शोधकर पी-एचडी उपाधि हासिल करना चाहते हैं, उन्हें सवैतनिक अवकाश देने संबंधी नियम लागू किया जाए। विशेष योग्यता धारक शिक्षकों एमड, नेट, पीएचडी धारकों को विशेष योग्यता भत्ता या प्रोत्साहन भत्ता के रूप में अग्रिम वेतन वृद्घि का लाभ दिया जाए। अधिकांश उत्क्रमित उच्च विद्यालयों का अपना भवन बन चुका है। अतः इन विद्यालयों में कार्यरत माध्यमिक शिक्षकों की वरीयता एवं प्रतिष्ठा का ध्यान रखते हुए इन्हें मध्य विद्यालय के प्रशासनिक नियंत्रण से मुक्त किया जाए। उच्चतर माध्यमिक प्लस टू शिक्षकों का अलग कैडर बनाकर उन्हें प्रवक्ता या व्याख्याता पदनामित किया जाए तथा उच्चत्तर वेतनमान दिया जाए। शिक्षकों को गृह जिला में स्थान्तरण संबंधी प्रावधान हेतु सेवा नियमावली में अविलंब बदलाव किया जाए।

Ganpat Aryan

Ganpat Aryan

Multimedia Journalist

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