विजयदशमी पर महिलाओं ने सिंदूर खेला, मैसूर में शाही दशहरा की रौनक

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नई दिल्ली.नवरात्रि के बाद बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक दशहरा पर्व शनिवार को देशभर में धूमधाम से मनाया गया। नौ दिन तक दुर्गा पूजा के बाद शनिवार को बंगाली महिलाओं में सिंदूर खेलकर विजयदशमी मनाई। मैसूर और कुल्लू का दशहरा पूरी दुनिया में मशहूर है। मैसूर में 600 सालों से ज्यादा पुरानी ऐतिहासिक परंपरा आज भी बदस्तूर जारी है। यहां देश-विदेश से हर साल हजारों लोग शाही दशहरा देखने के लिए आते हैं।
 मैसूर राजमहल में नौ दिन लगता है दरबार…
– परंपरा के मुताबिक, यदुवीर नवरात्रि के दौरान राजमहल में दरबार लगाते हैं। आखिरी दिन सवारी के साथ नगर भ्रमण पर निकलते हैं। इस जंबू सवारी को देखने के लिए हर साल करीब 6 लाख लोग मैसूर पहुंचते हैं।
 
मैसूर दशहरे में क्या है खास?
– दशहरा पर मैसूर के राजमहल में खास लाइटिंग होती है। सोने-चांदी से सजे हाथियों का काफिला 21 तोपों की सलामी के बाद मैसूर राजमहल से निकलता है। जो करीब 6 किलोमीटर दूर बन्नी मंडप में खत्म होता है। काफिले की अगुआई करने वाले हाथी की पीठ पर 750 किलो शुद्ध सोने का अम्बारी (सिंहासन) होता है, जिसमें माता चामुंडेश्वरी की मूर्ति रखी होती है। पहले इस अम्बारी पर मैसूर के राजा बैठते थे, लेकिन 26वें संविधान संशोधन के बाद 1971 में राजशाही खत्म हो गई। तब से अम्बारी पर राजा की जगह माता चामुंडेश्वरी देवी की मूर्ति रखी गई।
 
इस दशहरा में न राम और न ही रावण
– राजशाही की परंपरा लोकतांत्रिक व्यवस्था में बदली जरूर, लेकिन मैसूर के दशहरा का शाही अंदाज आज भी बरकरार है। मैसूर का दशहरा अन्य दशहरों से अलग है क्योंकि यहां न राम होते हैं और न ही रावण का पुतला जलाया जाता है। बल्कि देवी चामुंडा के राक्षस महिसासुर का वध करने पर धूमधाम से दशहरा मनाया जाता है
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