सरकारी सहायता के लिए दर-दर भटकती थी, अब 2000 महिलाओं को बना चुकी हैं आत्मनिर्भर

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छपरा । पहले सरकारी सहायता के लिए बैंक व सरकारी कार्यालयों का चक्कर लगाती थी, अब दो हजार महिलाओं को आत्मनिर्भर बना चुकी हैं । भले ही यह बात सुनकर आपकों अटपटा या अजीब सा लगता है, लेकिन सौ फीसदी सच है । छपरा सदर प्रखंड के जलालपुर गांव की महिला एकता समूह इसकी मिशाल है । एक महिला ने पहले 14 महिलाओं को संगठित किया, फिर समूह बनाकर बचत शुरू की । बैंक में खाता खोला और बचत की गयी राशि से सीमित संसाधनों में व्यवसाय शुरू किया और देखते ही देखते आत्मनिर्भर बन गयी । अब आज यह समूह एक विशाल स्वरूप धारण कर लिया है जिसमें 200 समूह आपस में जुड़े हैं और 2000 महिलाएं जुङी हैं । सबसे गंभीर बात यह है कि महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से सरकार की कई महत्वपूर्ण योजनाओं का संचालन किया जा रहा है, लेकिन योजनाओं का लाभ धरातल पर काम करने वाली इन महिलाओं को नहीं मिला है । केंद्र और राज्य सरकार के द्वारा संचालित योजनाओं को यह महिला समूह मूंह चिढा रही है । सदर प्रखंड के जलालपुर- खलपुरा गांव की सैकड़ों महिलाएं सरकार या बैंकों के चक्कर में नहीं पङना चाहती है ।

रेणु देवी

 

14 महिलाओं ने बनाया समूह

अपने बलबूते एक समूह के गठन कर आत्मनिर्भर बनने की राह पर चल पड़ी गांव की 14 महिलाओं ने 14 केमिकल को मिलाकर समिति संसाधन में सिर्फ एक लघु उद्योग चलाना शुरू किया, लेकिन किसी तरह की सरकारी या अन्य सहयोग नहीं लिया। ऐसा नही है कि वह सरकारी सरकारी सहायता नहीं चाहती थी, लेकिन इसकी जटिल प्रक्रिया ने खुद अलग राह चुनने को मजबूर कर दिया । वर्तमान समय में भी सरकारी सहयोग व सहायता मिलने पर बङे पैमाने पर इसे अपना सकती है। जिले के बैंकों ने जीविका व स्वयं सहायता समूह के बीच लाखों-करोड़ो रुपए लोन के रूप में राशि की स्वीकृति दी है, ताकि महिलाएं आत्मनिर्भर बन सम्मान के साथ अपना जीवन जी सके, लेकिन एकता स्वयं सहायता समूह की 14 महिलाओं ने ठाना है कि जब मुझे सरकारी सहयोग की जरूरत थी तो, उस समय बैंकों का चक्कर लगाते लगाते थक गई थी।

अब सरकारी सहायता की जरूरत नहीं

अब मुझे किसी तरह का कोई सहयोग नहीं चाहिए, क्योंकि हम लोग खुद अपने पैरों पर खड़े हो चुके हैं। एकता स्वयं सहायता समूह की रेनू ने बताया कि 14 महिलाओं ने मिलकर 14 केमिकल को मिलाकर तैयार करते हैं और उसे आस-पास में खरीदारी करती हूं बाहर के बाजारों में भी हम लोगों की पहुंच नहीं हैं । मंजू देवी का कहना है बैंकों का चक्कर लगाने से बेहतर है कि आपस में पैसे इकट्ठा कर सीमित संसाधन में छोटा सा उद्योग लगा कर आत्मनिर्भर बना जाए, क्योंकि गरीब आदमी आगे बढ़ने के बजाय पीछे ही रह जाएंगे। महिलाओं, गरीबों, दुकानदारों और छोटे उद्यमियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सरकार ने मुद्रा लोन जैसे अति महत्वपूर्ण योजनाओं का शुभारंभ की है, लेकिन इस योजना का लाभ गरीब महिलाओं को नसीब नहीं हो रहा है। 8 मार्च को महिला दिवस की धूम रहेगी। महिलाओं की सम्मान की बातें होंगी, लेकिन महिलाओं के अधिकार की बात केवल महिला दिवस तक रह जाती है। उसके बाद ना कोई पूछने आता है और ना ही कोई सहयोग करने। वहीं महिलाओं की वरदान साबित हो रही है केरल की सिस्टर ज्योति, जिन्होंने बेसहारा गरीब महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए लगातार 10 वर्षों से गली- गली की खाक छान रही है । उन्होंने अभी तक 200 से ज्यादा स्वयं सहायता समूह का गठन कर दो हजार से ज्यादा महिलाओं को आत्मनिर्भर बना चुकी हैं।

गिरवी रखी जमीन को छुड़ाया
आज कल की महिला पहले जैसी घर की चौखट के अंदर रहने वाली नहीं बल्कि अपने बलबूते खेती गृहस्थी के साथ दुकानों पर बिक्री होने वाले पाउडर, पापड़, आइसक्रीम पार्टी जैसे खाद्य पदार्थ को अपने से तैयार कर रही है और खुद, उसका इस्तेमाल तो, करती ही हैं । साथ में गांव की दुकानों में खुले बाजारों में बिक्री कर आत्मनिर्भर बन रही हैं ।

इतना ही नहीं, बल्कि जोत वाली जमीन को बंधक रखकर अपना व अपने परिवार के लिए रोजगार व पैसे की व्यवस्था करने वाली ग्रामीण महिलाओं ने मिलकर एक स्वयं सहायता समूह का गठन की और प्रति महीने आंशिक राशि को इकट्ठा कर बैंक में खाता खोलकर एकत्र की, फिर क्या था उसी जमा धन से लेकर जमीन को बंधक मुक्त कराया । एकता स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिला भागवती देवी का कहना है कि 5 वर्ष अपनी बेटी की शादी करने के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे, तो जमीन को विवश होकर बंधक रख दिया । बाद मे जब वह स्वयं सहायता समूह से जुड़ी तो, जमीन को मुक्त कराया और स्क्रीम, प्रोटीन सर्फ बना कर तैयार कर बेचने लगी ।

भोपाल में बेटा करता है इंजीनियरिंग की पढ़ाई

आज आत्मनिर्भर बन गयी । मेरा एक बेटा भोपाल में की पढ़ाई कर रहा है। छोटा बेटा गांव में एक मोबाइल का दुकान कर अपने परिवार का भरण पोषण में सहयोग करता है। इतना सब मैंने किया है, वह सब एकता स्वयं सहायता समूह के बदौलत करने में सफल हुई है। लोहरा गांव निवासी डोलन राम की 70 वर्षीय विधवा बदामो देवी का कहती हैं कि हमारे पास बहुत ही कम जमीन है जिसे अपने पति के इलाज के लिए बंधक कर दी थी और उसे अपने पास वापस लेने के लिए पैसे नहीं थे, लेकिन समूह से जुड़ने के बाद उस जमीन को बंधन मुक्त ही नहीं कराया बल्कि चिंता मुक्त कर मेहनत मजदूरी कर अपने परिवार का भरण पोषण करती हूं। साथ ही एक बेटा है जो मजदूरी के लिए दर-दर की ठोकर खाता, आज वह अपनी खेती कर आत्मनिर्भर हो गया है जिसमें वह सहयोग करती है ।

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Ganpat Aryan

Web Media Journalist

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