एक मंदिर ऐसा भी जहाँ गर्भगृह में शिवलिंग के बगल में है मज़ार

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 श्रद्धालु शिवलिंग पर फूल-जल चढ़ाने के साथ मज़ार पर भी टेकते हैं मत्था

समस्तीपुर । जिले के ताजपुर थाने के एक गांव मोरवा के पास एक मंदिर के बाहर लोगों का बड़ा हुजूम देखकर रुक गया। पूछने पर किसी ने मंदिर का नाम खुदनेश्वर मंदिर बताया। बड़ा अजीब-सा नाम लगा – ख़ुदा और ईश्वर का मंदिर। वहां मौजूद कुछ ग्रामीणों ने मुझे एक बार चलकर मंदिर का गर्भगृह देख लेने का अनुरोध किया। भीतर जाकर मैं भौंचक रह गया। गर्भगृह में एक तरफ शिवलिंग था और दूसरी तरफ एक मज़ार। सैकड़ों श्रद्धालु शिवलिंग पर फूल-जल भी चढ़ा रहे थे और मज़ार पर भी मत्था टेक रहे थे। यह आपके जीवन का पहला अनुभव हो सकता है । गर्भगृह के दृश्य मंत्रमुग्ध कर देती है । वहां के पुजारी ने मंदिर के इतिहास के बारे में बताया कि सदियों पहले यह इलाका वन क्षेत्र था। यहां एक मुस्लिम लड़की खुदनी बीवी अक्सर गाय चराने आया करती थी। जंगल में एक जगह चमत्कार जैसा कुछ देख कर वह भागकर गांव में पहुंची। ग्रामीणों ने इस जगह की खुदाई की तो एक भव्य शिवलिंग यहां मिला। कुदाल की मार से शिवलिंग का कटा हुआ ऊपरी हिस्सा अब भी देखा जा सकता है। लोगों ने इसी जगह पर शिवलिंग की स्थापना कर दी। खुदनी के मरने के बाद उसकी इच्छा के अनुसार मुसलमानों ने शिवलिंग के बगल में उसे भी दफना दिया । मंदिर का पहला निर्माण 1858 में हुआ जिसके बाद कई बार इसका पुनर्निर्माण हुआ है।

खुदनेश्वर मंदिर गांव के सरल, भोले – भाले लोगों का मासूम – सा धार्मिक घाल- मेल है। सुखद ये है कि लोगों तक धार्मिक कट्टरवादिता की हवा यहां अबतक नहीं पहुंची है। देश में सांप्रदायिक सौहार्द्र, धार्मिक सहिष्णुता की इससे बेहतर मिसाल कम ही मिलेगी। दुखद यह है कि अपनी स्थापना के सदियों बाद भी यह मंदिर धार्मिक पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र नहीं बन पाया है, जिस देश के हिन्दू और मुस्लिम मानस का ज्यादातर हिस्सा एक अरसे से मज़हबी कट्टरता ने घेर रखा है, वहां अब मासूम खुदनी बीवी और भोले बाबा का एक साथ प्रवेश शायद मुमकिन नहीं है।

Ganpat Aryan

Ganpat Aryan

Multimedia Journalist

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